शनिवार, 2 अप्रैल 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 9

एक पत्रकार की अखबार यात्रा की नौवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 9


19. सरोकार की खबरें और सामंतों पर प्रहार

पाटलिपुत्र टाइम्स की उदारता की वजह से मुझे इस अखबार में सरोकार की खबरें लिखने का भी भरपूर मौका मिला और मैंने जमकर लिखा भी। गरीबी और गरीबों के शोषण पर मैंने काफी कुछ लिखा। शोषण करनेवाले सामंतों और गरीबों का खून चूसनेवाले व्यापारियों के खिलाफ खूब रिपोर्टें और फीचर लिखे। इसी कड़ी में ऐसी ही एक खबर लिखी थी मुंगेर जिले के संग्रामपुर प्रखंड के भगत सामंतों के बारे में। खबर की हेडिंग थी- ऐसे पचता है गरीबों का जेवर और रजवाड़ों का हीरा। यह स्टोरी अंग्रेजों के जमाने से बिहार के आरा जिले से आकर संग्रामपुर में बस गए भगत सामंतों के बारे में थी। इलाके के बूढ़े-बुजुर्ग इन भगत सामंतों की कहनियां सुनाते थे। वे बताते थे कि कहते हैं ये भगत सामंत आरा से सिर्फ एक लोटा लेकर यानी खाली हाथ यहां आए थे। यहां आकर शुरू में उन्होंने कृषि उत्पादों पर आधारित छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू किए। कुछ भगत उस समय इलाके में घूम-घूमकर तरह-तरह के जरूरत के सामान बेचा करते थे। थोड़े समय बाद वे इलाके के भोले-भाले गरीब किसानों को उनके सोने-चांदी के जेवर और कांसे के बरतन वगैरह गिरवी रखकर कर्ज देने लगे। सामंत जेवर के कुल मूल्य का आधे से भी कम यानी लगभग एक तिहाई रकम कर्ज पर देते थे और उसका हर माह तीन रुपया प्रति सैकड़ा के हिसाब से सूद वसूलते थे। थोड़े ही समय में कर्ज में ली गई रकम और उसका सूद मिलाकर इतना भारी हो जाता था कि वह जेवर की कीमत से भी अथिक हो जाता था। उसके बाद जब लोग अपने जेवर छुड़ाने जाते तो सामंत कहता कि आप अपना जेवर नहीं ले गए इसलिए वह लहना-गहना हो गया यानी वह जेवर अभ सेठ का हो गया और वह अब नहीं मिलेगा। न हम अब आपसे अपना पैसा लेंगे और न आपको आपका जेवर लौटाएंगे। आपकी-हमारी बात खत्म हो गई। नतीजा यह होता था कि गरीब खाली हाथ घर लौट जाता था और सामंत को एक तिहाई कीमत में ही सोने-चांदी के महंगे जेवर हासिल हो जाते थे। कहते हैं इन भगत सामंतों ने इस तरह गिरवी के जरिए पूरे इलाके का सोना-चांदी अपनी तिजोरियों में खींच लिया।

संग्रामपुर के ये भगत सामंत उन दिनों चोर भी पालते थे और उनसे इलाके के मालदार लोगों के घरों में चोरियां करवाते थे। फिर चोरी का माल औने-पौने दामों में खुद खरीद लेते थे। इन सामंतों ने उन दिनों मुंगेर जिले का ही हिस्सा रहे गिद्धौर के रजवाड़े में भी कई दफा चोरियां करवाई थी। उस रजवाड़े का सोना-चांदी और हीरे–जवाहरात इसी संग्रामपुर के भगतों की तिजोरियों में आकर समाया करते थे। इस तरह अर्जित किया गया सारा सोना-चांदी और जवाहरात संग्रामपुर में इस भगतों की कड़ाहियों में ही गलाया जाता था। कहते हैं कि गिद्धौर महाराजा का रत्न जड़ित एक मुकुट चोर चुराकर ले आए थे और संग्रामपुर के भगतों ने कई दिनों तक बहुत मोल-तोल करने के बाद उसे खरीदा था जिससे इलाके में हल्ला हो गया था और पूरा इलाका जान गया था कि गिद्धौर महाराजा का चोरी गया मुकुट संग्रामपुर में बिका है और भगतों ने ही उसे खरीदा है। इस तरह बेहद गरीबी में लोटा लेकर आए सामंत लगातार अमीर होते गए। बाद में इस सामंतों ने अपना धंधा फैलाया और हर तरह का व्यवसाय करने लगे। आज पूरा संग्रामपुर बाजार क्षेत्र इन्हीं भगत सामंतों का है। मेरी स्टोरी जब छपी थी तो पूरे इलाके में हंगामा हो गया था। संग्रामपुर के तत्कालीन प्रखंड प्रमुख और संग्रामपुर बाजार के नामी व्यापारिक हस्ती राजेंद्र प्रसाद भगत ने पाटलिपुत्र टाइम्स के संपादक को चिट्ठी लिखकर मेरी शिकायत की थी कि मैंने अखबार में काफी उलूल-जलूल लिख दिया है। और इसके लिए उन्होंने संपादक से मुझे नौकरी से निकाल देने का अनुरोध किया था। इन भगत सामंतों ने उस समय अपनी एक बैठक करके मुझे मारने-पीटने की भी योजना बनाई थी।

ऐसी ही सरोकार की एक खबर संग्रामपुर प्रखंड के जमुआ गांव की दलित बस्ती जमुआ मुसहरी के बंधुआ मजबूरी करनेवाले महादलित परिवारों और जमुआ गांव के एक राजपूत सामंत के बारे में भी लिखी थी। उस खबर की हेडिंग थी- डेढ़ पसेरी खेसारी में बिक गई इनकी जिंदगी। रामसुंदर सिंह नामक उस सामंत ने एक बार अकाल पड़ने पर इस दलित बस्ती के एक दलित को प्राण रक्षा के लिए डेढ़ पसेरी (साढ़े सात किलो) खेसारी उधार दिया था। वह दलित उस उधार की खेसारी के सूद तले उस सामंत के खेतों में बरसों तक बिना किसी मजदूरी के काम करता रहा पर कर्ज की खेसारी नहीं चुका पाया। कुछ सालों बाद उस सामंत ने गांव के अन्य सामंतों की मदद लेकर एक सभा बुलाई और उस दलित से कर्ज में ली गई खेसारी के मूल्य के असल और सूद की कुल जमा रकम के एवज में अपनी सारी जमीन सामंत रामसुंदर सिंह को बेचने के पहले से बनाकर लाए गए एक एकरारनामे पर जबरन अंगूठा लगवा लिया और फिर उस दलित की सारी जमीन पर जबरन नाजायज कब्जा कर लिया। जब यह खबर छपी थी तो देश में बंधुआ मजदूरी के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलानेवाले आर्यसमाजी नेता स्वामी अग्रिवेश मुझे बधाई देने पटना पाटलिपुत्र टाइम्स अखबार के दफ्तर आए थे। जमुआ महादलित बस्ती के मांझी कहे जानेवाले मुसहर जाति के दलित आज भी बताते हैं कि उनके पूर्वजों की करीब नौ बीघा खानदानी खतिहानी जमीन बिना किसी रजिस्ट्री या बैनामे के अभी भी राजपूत सामंत रामसुंदर सिंह के खानदान के कब्जे में पड़ी है।

20. ढिबरीवाला रिक्शा और जिंदगी की जद्दोजहद

अस्सी के दशक में राजधानी पटना की तस्वीर आज से बिल्कुल अलग थी। पूरे शहर में हर तरफ गरीबी और अभाव में जीवन जीने की जद्दोजहद साफ-साफ दिखती थी। हर तरफ संघर्ष करते लोग नजर आते थे। पत्रकारिता भी उस समय संघर्ष वाली ही थी। उस समय ऑटो और ई-रिक्शा नहीं था। शहर में एक जगह से दूसरी जगह जाने का एक मात्र जरिया सायकिल रिक्शा ही हुआ करता था। रिक्शे में आगे की तरफ छोटी सी किरासन तेल वाली एक ढिबरी टंगी होती थी जिसे चालक शाम ढलने के बाद अंधेरे में रोशनी के लिए जला लेते थे। सायकिल रिक्शे में रोशनी के लिए ऐसी व्यवस्था मैंने और कहीं नहीं देखी थी। बिहार के गांवों से रोटी कमाने शहर आए गरीब रिक्शा चलाकर ही अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे। रिक्शे का किराया भी दो-चार रुपए ही होता था। वह भी कई बार गरीब और मध्यमवर्गीय मुसाफिरों को देने में जबूर लगता था। बेली रोड पर जहां आज बड़ी-बड़ी दुकानें और शो-रुम खुल गए हैं वहां उस समय वैसा कुछ चमक-दमक नहीं था। उसके पीछे गरीब रिक्शाचालकों और शहर के भिखमंगों का आशियाना हुआ करता था। वहां एक टूटू-फूटा बरामदे जैसा स्ट्रक्चर हुआ करता था जहां सारे रिक्शा चालक अपनी पूरी गृहस्ती एक बक्से में समेटे रहते थे। वहां दर्जनों की संख्या में ऐसे बक्से रखे होते थे जिनमें ताला पड़ा होता था। रिक्शेवाले दिनभर रिक्शा चलाते और रात को वहीं खाना पकाते और खाकर सो जाते। करीब-करीब यही हालत वहां रात काटनेवाले उन भिखारियों की भी होती थी।

मैं उन दिनों पटना के एक निम्न मध्यमवर्गीय मोहल्ले दक्षिणी मंदीरी में एक कमरा किराए पर लेकर रहता था और वहीं बड़े नाले के पास के एक ढाबे में खाना खाता था। इनकम टैक्स चौराहे के पास से कदमकुआं का रिक्शा किराया करीब डेढ़-दो रुपया हुआ करता था। पर मैं रोज रिक्शा नहीं लेता था क्योंकि जेब में हमेशा पैसे भी नहीं होते थे। गाहे-बगाहे या कभी-कभार देरी हो जाने पर ही रिक्शा लिया करता था। बाकी दिनों में पैदल गांधी मैदान के पास से गुजरते हुए या फिर गांधी मैदान को बीच से चीरते हुए करीब आधे घंटे चलकर दफ्तर पहुंचा करता था। इससे पैसे की बचत होती थी और रोज टहलना भी हो जाता था।

पाटलिपुत्र टाइम्स में तनख्वाह नियमानुसार मिलती थी जो उस समय 930 रुपए होती थी। इसमें 175 रुपए मकान का किराया देता था और 250 रुपए ढाबे वाले को महीने भर दोनों वक्त के खाने का। पैसे की दिक्कत तो हमेशा रहती ही थी। दफ्तर के पास ही फुटपाथ पर जुगल बाबू का एक प्रसिद्ध चाय का ठीया था। दफ्तर से निकलते ही बाईं तरफ ठाकुरबाड़ी रोड पर करीब सौ गज पर वह ठीया था। पटना के हुंकार प्रेस के पास की चाय दुकान से तोड़ा कम प्रचलित क्योंकि जुगल बाबू की चाय दुकान पर सिर्फ पाटलिपुत्र टाइम्स के पत्रकारों का ही जमावड़ा लगता था। कई बार अलग-अलग टोलियों में निकलकर हम दो-तीन बार भी चाय पी लिया करते थे। जब ज्ञानवर्धन भैया साथ होते थे तो हर बार चाय के पैसे वही दिया करते थे। जब जेब में पैसे नहीं होते थे तो जुगल बाबू हमें उधार की चाय भी खुशी-खुशी पिलाते थे। हुंकार प्रेस की तरह यहां भी पत्रकारों का उधारी का खाता चलता था। मुख्य उप संपादक शाहिद भाई के साथ रात की पाली में रहते हुए जब चाय की तलब होती तो ठीया अक्सर बंद मिलता था। जुगल बाबू तब तक घर जा चुके होते थे। चाय पिलाने में भागलपुर के अंजनी कुमार विशाल बहुत उदार रहते थे। पर इसके बदले मुझे अक्सर उनका कुछ एक्स्ट्रा काम करना पड़ता था। उनपर जब काम का बोझ होता और पिछले दिन के काम का बैकलॉग होता था तो वे अपना पेज मुझसे लगवा लेते थे। बदले में चाय पिलाते थे। कुल मिलाकर पाटलिपुत्र टाइम्स में हमारा आपसी रिश्ता बिल्कुल पारिवारिक जैसा ही था। अखबार प्रबंधन से भी हमारा रिश्ता कभी प्रोफेशनल वाला नहीं रहा।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....



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