शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 50

 

एक पत्रकार की अखबार यात्रा की पचासवीं किस्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 50


117. दिल्ली में सक्रिय हिंदी संपादक सप्लायर गैंग

 

पत्रकारों के भ्रष्टाचार की कहानियां और मीडिया के इस भ्रष्टाचार का रहस्य बहुत गहरा जान पड़ता है। आप इसके कुएं में जितना गहरे उतरते जाएंगे उतना अधिक रहस्य सामने आता जाएगा। देश की राजधानी दिल्ली ही अब पत्रकारिता की राजधानी बन गई है। सबकुछ इसी राजधानी से तय होने लगा है। जानकारी मिली है कि दिल्ली में हिंदी के कुछ बड़े संपादक टाइप पत्रकारों का एक ऐसा ताकतवर  गिरोह है जो देश भर में कहीं से भी हिंदी का कोई अखबार या पत्रिका शुरू हो, उसके लिए संपादक की सप्लाई यही गिरोह करता है। सिर्फ संपादक ही नहीं, उसकी सेकेंड और थर्ड लाइन में कौन लोग होंगे यह भी यही गिरोह तय करता है। जानकारों का कहना है कि शातिर पत्रकारों का यह गिरोह अखबारों-पत्रिकाओं में रचनाकारों, अनुवादकों और संवाददाताओं की आपूर्ति करने का भी ठेका लेता है। इसके लिए बाकायदा डील होती है। कुछ-कुछ उसी तरह जैसे किसी पुलिस थाने का कोतवाल या फिर किसी जिले का एसपी बनने के लिए डीलिंग हुआ करती है। यह गिरोह देश की कई नामचीन पत्रिकाओं और मौजूदा डॉट कॉम मीडिया कंपनियों के अलावा भारत में विदेशी प्रकाशकों का हिंदी और अंग्रेजी एजेंट बनकर भी अच्छा कमीशन बना लेता है। इस गिरोह को आप बड़े धंधेबाज और बड़े दलाल पत्रकारों का गिरोह भी कह सकते हैं। कुल मिलाकर यह गिरोह अमेरिका के लॉस एंजेल्स और शिकागो के ड्रग कार्टेल गिरोह की तरह ही है। यानी भारत का मीडिया कार्टेल।

शातिर हिंदी संपादकों का यह गिरोह और उनका यह धंधा पिछले आठ-दस सालों में विकसित हुआ है। रीजनल से राष्ट्रीय बने हिंदी के कुछ बड़े अखबारों की शाखाओं में यह गिरोह ज्यादा सक्रिय रहा है। प्रभाष जोशी के समय यह गिरोह टूटा था, पर फिर सक्रिय हो गया। इस रैकेट में भोपाल, इंदौर, लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, पटना और गुवाहाटी शहर शामिल है। जानकार कहते हैं कि राजधानी दिल्ली में प्रेस क्लब से इस अघोषित गिरोह का अघोषित दफ्तर चलता है।

यही गिरोह तय करता है कि कहां किस अखबार या पत्रिका में कौन संपादक बनेगा या बनकर जाएगा। संपादक इसी गैंग की मर्जी का होता है। जाहिर है हर जगह संपादक इसी गैंग के लोग या फिर इसी गैंग के पसंद के लोग होते हैं। कुछ पत्रकार संपादक बनने के लिए इस गैंग से जुड़कर गिरोह के दादाओं की मनुहार करने लगते हैं। गैंग से जुड़नेवाले पत्रकार संपादक नहीं तो कम से कम सहायक संपादक, मैगजीन संपादक या समाचार संपादक जैसा कुछ बनवा दिए जाते हैं। दिमाग पर थोड़ा जोर डालेंगे और पिछले कुछ सालों पर नजर दौड़ाएंगे तो आपको खुद पता चल जाएगा और आपको पत्रकारों में ऐसे कुछ खास नाम मिलेंगे जो देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में संपादक बनकर आते-जाते रहते हैं। इस गिरोह के कुछ डीलर संपादकों से मेरा भी सामना हुआ है। कुछ मेरे साथी पत्रकार भी हैं जो बाद में इस गिरोह से जुड़कर कई जगह संपादक बने। यह और बात है कि उनमें डीलरशिप वाले गुण मौजूद थे और भरपूर बड़बोलापन भी था।

 

118. मालिकों के लिए विदेशी मुद्रा और लड़की का इंतजाम

 

पत्रकारों को कैरियर में आगे बढ़ने के लिए अपने संपादकों और मालिकों को खुश करना पड़ता है और इसके लिए उन्हें अपनी नौकरी के दौरान अखबारनवीसी के अलावा कई और भी नैतिक-अनैतिक काम करने पड़ते हैं। पर यह छोटे पत्रकारों पर अमूमन लागू नहीं होता। खासकर संपादक, समाचार संपादक और ब्यूरो प्रमुखों से ऐसे काम कराए जाते हैं। राज्यों से निकलनेवाले अखबारों के दिल्ली स्थित ब्यूरो कार्यालयों के प्रमुख अपने मालिकों के लिए यह सब काम करते हैं। कभी-कभी अपने संपादक के लिए भी। इसमें एक काम मालिक की विदेश यात्राओं के लिए विदेशी मुद्रा का इंतजाम करना होता है। इसके अलावा मालिक जब किसी काम से दिल्ली पधारें तो उनकी अय्यासी के लिए लड़की की व्यवस्था करना भी उनकी जिम्मेदारी होती है। बाकी मालिक के आने-जाने के लिए हवाई टिकट का इंतजाम और दिल्ली शहर में आने-जाने के लिए कार वगैरह की व्यवस्था तो नार्मल चीजें होती हैं। सुनकर थोड़ा अटपटा लगता है और सिर भी शर्म से झुक जाता है पर जानकार बताते हैं कि बात यह बिल्कुल सच है और ऐसा होता है। यह सब बहुत समय से होता रहा है। देशभर के मीडिया घरानों का दिल्ली में जो सामूहिक बंगला है उसमें बने कमरों में सिर्फ खबरे ही नहीं लिखी जाती, मालिकों को खुश करने के लिए क्या कुछ करना है उसका इंतजाम कहां से और कैसे होगा उसकी डीलिंग भी यहां से की जाती है। अखबार मालिकों के इस सामूहिक भवन में बैठनेवाले कम से कम एक ऐसे ब्यूरो प्रमुख को तो मैं जानता ही था जो यह सब काम करते थे। वे मेरे बहुत वरिष्ठ भी रहे थे इसलिए कई बार अपनी मजबूरियां और परेशानियां बता भी देते थे। मैं जब भी उनसे मिलने गया उनके केबिन में कोई न कोई लड़की उनसे अकेले में बतियाते जरूर मिल जाती थी। वे लड़कियां वहां की स्टाफ नहीं होती थीं। तो क्या वे लड़कियां उनसे नौकरी मांगने आती थीं और वे उनको नौकरी दे देते थे या वे उनको नौकरी देने की स्थिति में होते थे। ऐसा कुछ तो बिल्कुल नहीं था। तो फिर मामला क्या था? जानकार बताते हैं कि अखबार मालिकों को जब सरकार से या सरकार के किसी मंत्रालय से अपना या अपने अखबार का कोई बड़ा काम कराना होता है तो वे इसके लिए संबंधित मंत्रालय के मंत्री या अधिकारी या सत्तारूढ़ राजनैतिक दल के किसी नेता को खुश करने के लिए अपने ब्यूरो चीफ से पैसों के लेनदेन के अलावा और भी कई तरह के जरूरी इंतजाम कराते हैं और उसी सब इंतजामों के तहत यह सब भी किया कराया जाता है। जिन मंत्रियों, अफसरों या नेताओं को खुश करना होता है उनको सुरा-सुंदरी उपलब्ध कराई जाती है। मतलब अखबार का दिल्ली ब्यूरो चीफ बाकी सब होने के अलावा एक दलाल भी होता है। बाकी आपसब जानते ही हैं कि आजकल लक्ष्मी और सुरा-सुंदरी के बिना कोई बड़ा काम नहीं होता। अब जब अखबार मालिक अपने काम के लिए इस तरह गंगा बहा रहा होता है तो उसमें संपादक और ब्यूरो चीफ भी थोड़ा हाथ धो लेते हैं और अगर मौका मिला तो नहा भी लेते हैं।

 

119. पत्रकार चलपति राव से सीखें ईमानदारी

 

आजादी के दिनों की हिंदी पत्रकारिता में ऐसे व्यक्तित्व होते थे जिनमें अपने देशसमाज और अखबार के प्रति एक समर्पण और उत्साह हुआ करता था। उनमें समर्पण और ईमानदारी कूट-कूट कर भरी होती थी। इसके ईमानदार और बेहतरीन उदाहरण थे नेशनल हेराल्ड के एक दक्षिण भारतीय पत्रकार मणिकोंडा चलपति राव जोनेशनल हेराल्ड के दिल्ली संस्करण के संपादक थे। चलपति राव साहब हुमायूं रोड स्थित अपने घर से आईटीओ स्थित अखबार के दफ्तर डीटीसी की बस से ही आते जाते थे। रिटायरमेंट के बाद वे पंडारा रोड पर रहने लगे थे। वे रोज सुबह अपने घर के पीछे थोड़ी दूरी पर स्थित एक चाय दुकान पर चाय पीने जाया करते थे। सत्तर के दशक में एक सुबह (25 मार्च 1983) वे उसी चाय दुकान पर चाय पीने गए तो वहीं गिर पड़े और वहीं उनका निधन हो गया। चायवाला उनको पहचानता था इसलिए उसने तिलक मार्ग थाने को इसकी सूचना दे दी। पुलिस आई और उनकी लाश उठाकर ले गई। लाश थाने से सीधे मुर्दाघर पहुंचा दी गई। उधर उनके घर पर आनेवाली कामवाली ने जब उन्हें वहां नहीं देखा तो उसने इसकी सूचना उनके पुराने दफ्तर नेशनल हेराल्डको दी। दफ्तर के लोगों ने उनकी तलाश शुरू की तो अगले दिन जाकर उनकी लाश मुर्दाघर में पड़ी मिली। और तब जाकर उनकी पहचान हुई। उनकी पहचान होने पर शहर में खासा हंगामा हुआ। राव साहब अविवाहित थे और अकेले रहते थे। उनका विवाह तो अंग्रेजी भाषा और पत्रकारिता से हुआ था। वे बेहद ईमानदार और एक अच्छे लेखक थे। कहते हैं उनके कमरे में न कोई फर्नीचर था और न कोई सामान। उनके कमरे में सिर्फ एक टू-इन-वन रेडियो टेपरिकार्डर और कुछ झोले वगैरह ही थे। एक फक्कड़ की तरह जीवन जीते थे राव साहब। राव साहब घोषित तौर पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बहुत करीबी थे फिर भी उन्होंने नेहरूजी से कभी कोई सेवा स्वीकार नहीं की। नेशनल हेराल्ड में उनके संपादकत्व के 30 साल पूरे होने पर आयोजित एक सभा में इंदिरा गांधी ने उनकी खूब तारीफ की थी। वे अपने दफ्तर से तनख्वाह भी बहुत कम ही लेते थे। कहते हैं एक बार जब वे हिन्दुस्तान टाइम्स में काम करते थे तो अखबार के मैनेजर देवदास गांधी ने उनका वेतन बढ़ा दिया था, पर राव साहब ने बढ़ी हुई तनख्वाह लेने से मना कर दिया। उन्होंने देवदासजी से कहा था,बस कीजिए देवदासजी। इस तरह पैसे देकर आप मुझे बर्बाद मत कीजिए। आप जानकर हैरान होंगे कि उन्होंने 1969 में पद्मभूषण पुरस्कार लेने से भी मना कर दिया था। आज देश में कितने ऐसे ईमानदार संपादक मिलेंगे?


– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....


 


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 49

 

एक पत्रकार की अखबार यात्रा की उनचासवीं किस्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 49


114. देश में करोड़पति पत्रकारों की बड़ी फौज कैसे?

वैसे तो करोड़ रुपए की संपत्ति होना आज की तारीख में कोई बड़ी चीज नहीं है। गांवों में पांच-सात बीघा जमीन होने भर से आदमी करोड़ रुपए की औकात वाला बन जाता है। पर इतनी जमीन आज के लमय में खरीद लेना आसान नहीं है। इतनी जमीन किसी के पास दादाओं-पड़दादाओं की अर्जित तो हो सकती है, पर कोई एक आदमी अपनी जिंदगी में इतनी जमीन बना ले यह आसान नहीं है और ईमानदारी की कमाई से तो बिल्कुल ही संभव नहीं है। हां, आज के समय में कुछ बड़े न्यूज चैनलों के ब्रांड बन गए पुरुष और महिला एंकरों को करोड़-सवा करोड़ की तनख्वाह मिलने लगी है तो उससे कुछ साल में कोई पत्रकार करोड़पति जरूर बन सकता है। पर इतनी मोटी तनख्वाह पानेवाले पत्रकार तो गिने-चुने ही हैं। मैं बात आज की नहीं, कोई दस-बीस-तीस साल पहले की कर रहा हूं। उस समय एक औसत पत्रकार की तनख्वाह हजार रुपए से लेकर तीन हजार और छह हजार रुपए के करीब हुआ करती थी। इतनी ही तनख्वाह पानेवाले कई पत्रकार कुछ ही समय में देखते ही देखते लाख नहीं, करोड़ नहीं, करोड़ों रुपए की संपत्ति के मालिक बन गए। पत्रकारों की इस अमीरी को आप क्या कहेंगे? क्या इतनी तनख्वाह में किसी महानगर में घर का खाना-खर्चा निकालकर किसी हालत में इतना अधिक पैसा जोड़ा जा सकता है। जवाब होगा नहीं। फिर इन पत्रकारों ने इतनी दौलत कैसे बना ली जो वे करोड़ और करोड़ों के मालिक बन बैठे। आप इसपर थोड़ा तजबीज करेंगे तो पाएंगे कि करोड़ और करोड़ों की संपत्ति बनाने के इस जादुई धंधे के पीछे ब्लैकमेलिंग का काला कारोबार ही है। और कोई दूसरा करिश्माई तरकीब है ही नहीं जो एक पत्रकार को केवल अखबारनवीसी से चंद बरसों में इस कदर दौलतमंद बना दे। हां, एक जरिया पॉलीटिकल लायजनिंग का भी है जो रातोंरात किसी पत्रकार की किस्मत बदल सकता है। सरकार में किसी मंत्री-संत्री से किसी बड़े कारोबारी का अंटका पड़ा कोई बड़ा और कठिन काम करवा दीजिए तो उस कारोबारी के साथ-साथ आपकी भी किस्मत बदल जाएगी। किसी बड़े आदमी या कारोबारी की गरदन कहीं फंस गई हो तो उसे छुड़वाने से भी आपकी किस्मत बदल सकती है। चुनाव के समय किसी पार्टी के पक्ष में हवा बनाने के लिए भी पैसे दिए जाने की परंपरा रही है। बड़ी पार्टियां छुनाव के समय बहुत पैसे खर्च करती हैं। पर ऐसे ज्यादातर पैसे अखबारों और समाचार चैनलों को विज्ञापनों के जरिए मिलते हैं। कुछ बड़े नेता लोग भी पैसे खर्च करके अपने पक्ष में हवा बनवाते हैं।

मैंने अपने साथ के और पहचान के कई औसत पत्रकारों को अपनी आंखों के सामने इस तरह महानगरों में चल-अचल संपत्ति खरीदकर दौलतमंद और करोड़ों का मालिक बनते देखा है। एक उप संपादक या रिपोर्टर के लिए मुंबई में आठ करोड़ का मकान खरीद लेना बिना ब्लैकमेलिंग के संभव नहीं है। दिल्ली के एक बड़े अखबार समूह के एक हिंदी अखबार के पत्रकार ने बाद में न्यूज चैनलों में जाकर दिल्ली एनसीआर में कई जगह प्राइम लोकेशनवाले प्लॉट करीद लिए। पत्रकारिता करके अपने घर-परिवार का विदेशी कनेक्शन स्थापित कर लेनेवाले पत्रकार तो बहुतेरे हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं या रह रहे हैं। खुद भी उन्होंने कई-कई देशों की यात्राएं कर डाली है। जहां एक औसत पत्रकार आज भी रेल से आनेजाने के लिए बड़ी मुश्किल से स्लीपर का टिकट ले पाता है, वहीं उसके साथ के ज्यादातर औसत पत्रकार एसी में ही चला करते हैं। जिन दिनों दिल्ली से पटना, लखनऊ और जबलपुर का स्लीपर का टिकट 250-300 रुपए के आसपास होता था जो ज्यादातर साथियों को महंगा लगता था, पर दिल्ली के कई पत्रकार उस समय भी एसी का ही टिकट मंगवाते थे। ऐसे पत्रकार मित्र हमेशा लग्जरी वाली लाइफस्टाइल की बातें किया करते थे और उसी जीवनशैली को जीते भी थे। राजधानी दिल्ली में पत्रकारिता की आग में तपनेवाले पटरी पर के एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि जब किसी पत्रकार के मुंह से बात-बात में लग्जरी टपकने लगे तो समझ लीजिए बंदा बहुत माल बना रहा है। जो दौलत बटोरने के इस समीकरण को नहीं सीख पाए और ईमानदारी की रोटी खाते रहे वे आज भी नमक-तेल-धनियां-मिरचाई का ही हिसाब जोड़ते दिख रहे हैं।

115. पत्रकारिता में तीरंदाजी का बड़ा खेल 


पत्रकारिता को गंदा करने वाले तत्वों और पत्रकारिता की ठेकेदारी करनेवाले पत्रकारों की तादाद कम नहीं है। अखबार के जरिए ब्लैकमेलिंग और कमाई की कहानियां हर शहर में सुनाई देती हैं। स्थानीय स्तर पर लोगों से दलाली की रकम वसूल सकने वाले बड़े अखबारों के पत्रकारों की संख्या भी अच्छी खासी है। हर प्रदेश की राजधानी और व्यावसायिक शहरों जैसे मुंबई, इंदौरलखनऊपटना आदि से भी ऐसी कहानियां आती हैं जिसमें किसी गरीब और औसत पत्रकार के एकाएक रईस बन जाने की कथा लिखी होती है।

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से छपनेवाले हिन्दी के प्रतिष्ठित अखबार नई दुनिया के बारे में वहां के कुछ बेहद पुराने पत्रकार बताते हैं कि नई दुनिया का 1979-81 का दौर स्वर्णिम और बेहद गौरव का वर्ष कहा जाता है। इन्हीं वर्षों में राहुल बारपुतेराजेंद्र माथुर, एनके सिंह, जय सिंह (जिन्होंने मालवी भाषा में एक उपन्यास लिखा था) और अखबार के मालिक अभय छजलानी चर्चा में होते थे। नई दुनिया में पहले पेज पर क्या खबर जानी है उसके जानकार यही लोग होते थे। इन सब के परस्पर मजबूत नजरिए ने नई दुनिया को एक बेमिसाल दैनिक बना दिया था। इस अखबार में उन्हीं प्रारंभिक दिनों में अखबार के पहले प्रशिक्षु रहे कुछ पत्रकार बताते हैं कि उस समय अखबार में स्थानीय पेज के इंचार्ज पत्रकार दिन में चार बजे दफ्तर आते थे और आठ बजे तक पेज का मेकअप कराकर घर चले जाते थे। पूरे शहर में उनकी तूती बोलती थी। उनका इतना असर था कि सरकार ने अखबार के मालिक और टेनिस के खेल प्रेमी रहे अभय छजलानी जी के लिए शहर के एक पॉश इलाके में न केवल जमीन दिलवाई बल्कि बाद में उनको वहां एक भव्य स्टेडियम भी बनाकर दिया। तब वहां के पत्रकार चर्चा किया करते थे कि अभयजी के पास न जाने कहां-कहां और कितने मकान हैं। हो सकता है उस समय यह बात सच भी रही हो।

इसी तरह लखनऊ में अस्सी नब्बे के दशक में और फिर बाद में भी न जाने कितने पत्रकारों ने पत्रकारिता के नाम पर अकूत संपत्ति बनाई। कुछ तो राजनेता भी बन गए। कई पत्रकारों ने लखनऊदिल्ली के आसपास ही नहीं,उत्तराखंड तक में अपने लिए ग्रीष्मकालीन आवास बनवा लिए। दिल्ली की बजाए अब सारे राष्ट्रीय दैनिक यूपी के एक जिले में सिमट कर खुद को राष्ट्रीय अखबार होने का दावा करते हैं। पर वास्तव में अब वे जिला स्तर के ही दैनिक रह गए हैं। यही हाल रायपुर में है जिसके बारे में काफी कुछ छपा भी है। तब वहां के मुख्यमंत्री एक पूर्व आईएएस अधिकारी थे। उनके पुत्र आज राजनीति में दौलत संभालने में लगे हैं। ऐसा ही पटना,जयपुरजम्मूश्रीनगर तक में भी हुआ। अखबारों की ताकतउनसे कमाई के पत्रकारों के मौकेमालिकों में उनके प्रति ईर्ष्या बढ़ाते गए। संपादक पद पर मालिक आ गए और संपादक उनके मैनेजर और प्रेत लेखक बन गए। राष्ट्रीय अखबारों मे आमतौर पर राजनीतिब्यूरो,खेलधर्म-ज्योतिष और स्थानीय खबर और व्यापार के पन्नों को उपहार संस्कृति में मान लिया गया है। राहुल बारपुतेराजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी इन आरोपों में कभी नहीं घिरे। पर आज जो कुछ हो रहा है वह सब हमलोग देख ही रहे हैं। अखबारों के पेज बिक जाते हैं। न्यूज चैनलों का पूरा का पूरा शो ही बिक जाता है। पैसे लेकर मनमाफिक इंटरव्यू आयोजित होते हैं और शो क्रिएट किए जाते हैं।


दक्षिण भारत का एक बड़ा मीडिया हाउस जिसका नाम बताने की जरूरत नहीं है, उसके मालिक अपने शुरुआती दिनों में अचार बना कर बेचते थे। धीरे-धीरे उन्होंने प्रगति की और अखबार शुरू कर लिया। अखबार की प्रगति के साथ वे फिल्म निर्माण में भी उतर गए और अपने नाम से एक फिल्म सिटी ही बना डाली। धीरे धीरे सैटेलाइट चैनल का जमाना आया तो कुछ चैनल भी लांच कर दिया और उसे बहुत सफलतापूर्वक चलाते भी रहे। आज तेलंगाना के सैकड़ों किलोमीटर के लंबे-चौड़े पर्वतीय भूभाग पर उनका साम्राज्य कायम है। पर क्या यह सब ईमानदारी की कमाई से अर्जित किया गया होगा या ऐसे ही हो गया होगाबिना किसी रैकेट के। अगर ऐसे ही हो जाता होता तो और भी बहुत सारे लोग कर लिया करते। इसलिए इतना तो मान ही लीजिए कि इन सब सफलताओं के पीछे एक बहुत बड़ा खेल हुआ होता है। और अचारवाले के किए हुए इस खेल को ही मीडिया में तीरंदाजी का खेल कहते हैं।


हर क्षेत्र में तीरंदाज होते हैं। उनमें शायद एक तरह की खानदानी जीन होती है जो वह गुर सिखा देती है जिसके कारण वे मौकों का लाभ उठाने लगते हैं। वे लोग मेहनती तो नहीं होते पर वे खुद को उद्योग मालिकोंप्रबंधकों,नेताओंअफसरों और समाज में उनको महान बताते हुए अपना बखान करते हुए उनसे झूठे-सच्चे तरीकों से पारिवारिकराजनैतिक और सामाजिक रिश्ते अलबत्ता विकसित कर लेते हैं। इसके चलते एक तरह की बार्टर प्रणाली विकसित हो जाती है जो उन्हें ऐश्वर्य की ओर ले जाती है। पत्रकारों का राज्यसभा जाना भी एक तीरंदाजी ही तो है जिसके लिए बड़े-बड़े पत्रकार-संपादक लालाइत रहते हैं।


मुझमें ऐसा कोई गुण या हुनर कभी नहीं रहा। इसलिए मैं इस चक्कर में भी कभी नहीं पड़ा। इसी कारण मैं कभी चारण भी नहीं बन सका। इस जिद के कारण ही मैं खुद को किसी बड़े और पहुंचवाले पत्रकारों की श्रेणी में या उनके बहुत दूर-दूर तक भी कहीं नहीं रख सका। यहां तक कि उनके पिछलग्गू होने तक की स्थिति भी अपनी कभी नहीं बन पाई। ऐसे में मैं यह नहीं जानता कि खबरों की ट्रेडिंग किस स्तर पर होती है और उसका लाभ कैसे मिलता है जिसे बांटते हुए अपना नेटवर्क बनाया जाता है। पर यह सब खूब होता है। खबरों की ट्रेडिंग भी खूब होती है और इसके लिए बड़े पत्रकारों का अपना नेटवर्क भी खूब होता है। संपादकों का भी अपना एक नेटवर्क होता है। यह नेटवर्क बहुत ताकतवर होता है। नेटवर्क वाला वह संपादक इस हालत में हो जाता है कि खबर रोकने से क्या लाभ होगा और मिलने वाली रकम का हिस्सा कैसे बांटना है जिससे काम करने वाले साथ बने रहें और आगे भी गुड़ आता रहे।


ऐसे भी कई संपादक हैं जो लंबे समय तक संपादक तो रहे पर अपना कभी कोई नेटवर्क नहीं बना पाए। कमाने की इस विद्या में माहिर संपादकीय कर्मियों के बारे में कहें तो वे चाहे समाचार के पन्नों पर हों या डाक, व्यापार या खेल के पन्ने पर या फिर वे राजनीतिक टिप्पणीकार हों, वे वहां से भी अच्छा खासा कमा ही लेते हैं। इसी कारण वे मरते दम तक पत्रकार बने रहना चाहते हैं। फिर खुद के कृतित्व को अभिलेखागार में रखने के लिए उद्विग्न भी दिखते हैं। ऐसे पत्रकार कम नहीं हैं जबकि उनका लिखा सारा कुछ किताबों में भी छपा ही होता है।


अंग्रेजी के पत्रकार पहले खासा कमाते रहे हैं। भाषाई अखबारों के कर्मियों ने इनसे ही यह गुर सीखा। हालांकि आज विजुअल मीडियाछोटे स्तर पर यू-ट्यूब से जुडे लोग इसमें ज्यादा कामयाब हैं। गैर हिंदी भाषाओं में सक्रिय लोग इसके उदाहरण हैं। इन क्षेत्रों में अग्रेजी पत्रकार कुछ ही हैं। हो सकता है भाषा पर उनका उतना कमांड न हो। संगीतसंवाद डिलीवरीनाटकीयता और प्रस्तुति वगैरह ज्यादा खर्चीला होता हो।

 

116. अस्तित्व की लड़ाई और चाय का ठेला


जो पत्रकार तीरंदाजी नहीं सीख पाए या कभी ऐसा नहीं कर पाए वे आज हेंड टू माउथ वाली स्थिति में हैं या फिर उससे भी नीचे आ गए हैं। ज्यादातर ईमानदार पत्रकार आज बहुत बुरी हालत में जी रहे हैं। नौकरी से निकले वैसे पत्रकारों का एक बड़ा तबका जिसमें कई सारे दौलतमंद पत्रकार भी शामिल हो गए हैं, आज यू-ट्यूबर बन गए हैं। हालत यह है कि जिसे देखो मोबाइल लिए पत्रकार बना हुआ है। पर यह भी जान लीजिए कि इस यू-ट्यब की पत्रकारिता में भी बड़े-बड़े रैकेट तक हो रहे हैं और जमकर तीरंदाजी की जा रही है। जो पहले नौकरी में रहते हुए तीरंदाज थे वे यहां भी उसके लिए जुगाड़ बना ही ले रहे हैं। ऐसे बहुत से पत्रकार हैं जो अब नौकरी में नहीं हैं और इस यू-ट्यूब की पत्रकारिता के जरिए आजकल काफी संपन्नता का जीवन जी रहे हैं। पर कहते हैं इसमें थोड़े ऐसे भी हैं जिनके लिए यह बमुश्किल दो वक्त की दाल-रोटी जुटाने का एक जरिया मात्र है।

दूसरी तरफ जो वास्तव में श्रमजीवी पत्रकार हैं उनके लिए यह समय अस्तित्व की लड़ाई है। इसीलिए अच्छे पत्रकार को अब कंपनियां सम्मानजनक जिंदगी जीने लायक वेतन नहीं देना चाहतीं क्योंकि लोग सस्ते में और बगैर पैसे के भी काम करने को तैयार हैं। यहां तक कि कुछ सुविधा शुल्क और विज्ञापन आदि देने को भी तैयार हैं। सब तो नहीं लेकिन बहुत से पत्रकार प्रापर्टी डीलिंग और दलाली करने वाले भी बन गए हैं। आखिर मीडिया हाउस को भी तो चलाने के लिए पैसा चाहिए।


नौकरी जाने से कठिन हालात में पड़ गए पत्रकार आज मजबूरी में चाय भी बेचने लगे हैं। कुछ पत्रकार थोड़े से पैसे में लोगों के दरखास्त लिखने और फार्म भरने का भी काम कर रहे हैं। वैसे चाय का ठेला यानी सड़कों-चौराहों पर छोटा टी-स्टाल लगाने का धंधा बुरा नहीं है। यह इज्जत की ही रोटी देती है। पर पत्रकारों का इस ओर जाना चिंता का विषय जरूर है। वह दिन दूर नहीं जब वास्तविक पत्रकार सम्मानजनक नौकरी न मिलने पर चाय की दुकानपटरी दुकानदार या अन्य कोई रोजगार ढूंढने को मजबूर होंगे। आखिर भूखे मरने से तो अच्छा है ही। वास्तविक पत्रकारों की जगह धीरे-धीरे तिकड़मबाज कब्जियाते जा रहे हैं। यह आगे भी होगा। बहुत कम पत्रकार ऐसे होंगे जो पंद्रह बीस साल की नौकरी के बाद संपादक या उसके समकक्ष पहुंच पाएंगे।


– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....



गुरुवार, 10 नवंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 48


एक पत्रकार की अखबार यात्रा की अढ़तालीसवीं किस्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 48


112. प्रतिष्ठित अखबार में बिजनेसमैन भी पत्रकार

बिहार में पत्रकारिता करने के दिनों में मैंने बहुत कुछ अजीबोगरीब भी देखा। पटना में एक बड़े अखबार की हैसियत हासिल कर लेनेवाले एक प्रतिष्ठित अखबार में उन दिनों एक ऐसे पत्रकार भी काम कर रहे थे जिनका उनदिनों शहर में अपना व्यवस्थित कारोबार भी हुआ करता था। वे अखबार में पत्रकार की नौकरी सिर्फ इसलिए करते थे ताकि अखबार और पत्रकारिता की हनक से उनके कारोबार का स्याह पक्ष कभी उजागर न हो और वे किसी कानूनी शिकंजे में न पड़ें और उनका कारोबार बिना किसी रोकटोक के बदस्तूर रहे। दफ्तर के संपादकीय विभाग में उनका काम अपनी कमियों को छिपाने के लिए दूसरों पर हर समय रौब जमाना होता था। वे हमेशा दूसरों की लाइन को छोटी दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे ताकि उनकी अपनी कमजोर लाइन बड़ी नजर आने लगे। उनमें जातिवाद कूट-कूट कर भरा था और दफ्तर के साथियों से उनका व्यवहार भी कुछ-कुछ इसी लाइन पर होता था। पर वे अखबार मालिक के राज्य से आए साथियों पर कभी कोई टोकाटाकी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। अखबार मालिक के शहर के लोगों पर टिप्पणी करने का तो कोई सवाल ही नहीं था और न ऐसा करने की उनकी कोई कूवत ही थी। एक प्रतिष्ठित अखबार के एक साधारण रिपोर्टर तो ऐसे थे जिनकी अवैध कमाई की उन दिनों डेस्क पर खूब चर्चा होती थी और लोग कहते थे कि उस समय उनकी हैसियत करोड़ रुपए से ऊपर जा चुकी थी। उनकी तनख्वाह उस समय कोई 15-20 हजार रही होगी। पटना शहर के जिस महत्वपूर्ण बीट को वे कवर करते थे उसमें उनकी जबरदस्त हनक थी। दफ्तर में कुछ लोग उनका बिहार के एक बड़े माफिया राजनेता से कनेक्शन होने की बात भी बताते थे। पर यह सब बिल्कुल सार्वजनिक मामला था और संपादक को भी इसका बखूबी पता था। फिर भी अखबार में उनकी नौकरी सुरक्षित रूप से चल रही थी। इसका मतलब आप जो भी समझें पर यही सच्चाई थी। राजधानी पटना में पत्रकारों को सरेआम पीटकर अधमरा कर देने वाले उस माफिया के पे-रोल पर बिहार के दूसरे अखबारों में काम करनेवाले और भी कई पत्रकार थे। बिहार में बड़े पत्रकारों के करप्ट होने का वह एक ऐसा दौर था जब यह चर्चा सुनाई दी कि उस प्रतिष्ठित अखबार के भी कुछ बड़े पत्रकारों और अखबार के नियंताओं ने पटना शहर के पॉश इलाकों में थोड़े ही समय के भीतर नामी-बेनामी तरीके से धड़ाधड़ कई मकान खरीद डाले। कुछ समय बाद यह भी सुनने में आया था कि इस भ्रष्टाचार की बात अखबार के मुख्यालय शहर तक भी पहुंच गई थी और अखबार के मालिक को देर-सबेर इसकी भनक लग गई थी। बाद चलकर मालिक ने इस भ्रष्टाचार का कुछ संज्ञान भी ले लिया था। अखबार के एकाध लोग खुर्द-बुर्द भी किए गए थे। पर कहते हैं कि मालिक भी भ्रष्टाचार में काफी गहराई तक जड़ें जमा चुके उन बड़े पत्रकारों और अखबार के नियंताओं पर कुछ खास एक्शन नहीं ले पाए क्योंकि कड़ी कार्रवाई होने पर बिहार में उस अखबार की चूलें हिल जाने का भी गंभीर खतरा था। कहते हैं अखबार के इन बड़े पत्रकारों और नियंताओं के पास उसप्रतिष्ठित अखबार के स्याह पक्ष की पूरी की पूरी कुंडली विराजमान है जो अखबार की सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकती है।

113. बिहार में अपहरण उद्योग से भी जुड़े रहे पत्रकार

पत्रकारों का सत्ता के करीब होना कोई नई बात नहीं है। पत्रकार तो सत्ताधीशों की रसोई तक में घुसकर खबर निकाल लाया करते हैं। इसे पत्रकारिता जगत में बुरा नहीं बल्कि सराहनीय माना जाता है। पर सत्ताधारी लोगों के घरों में पैठ रखनेवाले पत्रकार अगर सत्ताधीशों के काले धंधों में शामिल होने लगें तो उसे विध्वंशक ही माना जाता है। पर बिहार में ऐसे उदाहरण हैं जब पत्रकारों ने सत्ताधीशों के काले कारनामों में कई तरीकों से अपनी संलिप्तता कायम की औऱ उससे खूब पैसे बनाए। पटना की मीडिया में कई ऐसे पत्रकार हुए जिनका संबंध सत्ता से होने के साथ-साथ सूबे के बड़े-बड़े गुडों और माफिया गिरोहों से भी रहा। कहते हैं पटना के ही एक प्रतिष्ठित अखबार में कभी एक ऐसे दबंग पत्रकार भी हुआ करते थे जिनका संबंध बिहार में जंगलराज के दिनों में चलनेवाले अपहरण उद्योग से भी जोड़ा जाता था। वे जंगलराज के दिनों में उस समय की सत्ता के बहुत ही करीब थे। उन पत्रकार महोदय का अतीत भी बहुत खूंखार था सो वे हर समय रिवाल्वर लेकर चलते थे और दफ्तर भी रिवाल्वर के लाथ ही आया करते थे। उनके साथ के लोग बताते थे कि बिहार में जिन दिनों जंगलराज था उन दिनों राज्य में चलनेवाले अपहरण के कारोबार में वे पत्रकार महोदय अपहर्ताओं और अपहृत व्यक्ति के परिवारजनों के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाया करते थे और अपहृत व्यक्ति के परवारजनों से मोटी रकम लेकर अपहृत को छुड़वाने का काम करते थे। कहते हैं उस पत्रकार महोदय ने बिचौलिया बनने के इस कारोबार से जंगलराज के दिनों में करोड़ों रुपए बना लिए थे। पर जानकार बताते थे कि बिहार में जंगलराज के दिनों में चलनेवाले इस अपहरण उद्योग से बिचौलिया बनकर पैसा कमानेवाले और भी कुछ पत्रकार थे जो उस समय की सत्ता के बहुत करीब माने जाते थे। कहते हैं बिहार के वैसे पत्रकारों के आज अमेरिका और दूसरे बड़े देशों से कनेक्शन हैं। पर रैकेटियर पत्रकारों के बारे में मैं यहां यह सब जो कह रहा हूं वह कोई नई बात नहीं है। पत्रकारों के लिए ऐसे रैकेट तो मैंने दिल्ली और बंबई में भी देखे। खासकर अखबारों के संपादकों और बड़े रिपोर्टरों में। हां, बिहार में थोड़ा फर्क था और वह यह कि बिहार के पत्रकार पैसा कमाने के लिए जंगलराज में चल रहे अपहरण उद्योग का ही हिस्सा बन गए थे।

पत्रकार खबर छापकर भी पैसे कमाते हैं और खबर रोककर भी। पर खबर छापने से ज्यादा खबर रोकने के पैसे मिल जाते हैं। जितना बड़ा मामला होता है उसकी खबर रोकने के उतने ही ज्यादा पैसे मिलते हैं। पर इसके लिए जरूरी है कि आपके पास खबर ऐसी हो जो एकदम एक्सक्लूसिव हो यानी वह खबर सिर्फ आपके पास ही होनी चाहिए। इसे एक तरह की ब्लैकमेलिंग भी कह सकते हैं। कॉरपोरेट ब्लैकमेलिंग। और इस तरह की ब्लैकमेलिंग में वाकई बहुत पैसा है। यह काम स्टिंग ऑपरेशन के जरिए भी बहुत होता है। टीवी न्यूज चैनलों की अपनी चंद दिनों की नौकरी में मैंने इस खेल को थोड़ा करीब से देखा, जाना, समझा और महसूस भी किया। कॉरपोरेट घरानों की स्टिंग कराकर फिर उसकी क्लिप की एक झलक उन घरानों को दिखाकर या सिर्फ उस स्टिंग की जानकारी भर देकर मोटा पैसा वसूल लिया जाता है। अगर आपके पास मजबूत और दमदार स्टिंग है तो फिर मुंहमांगी रकम भी मिल जाती है। हां, स्टिंग ऑपरेशन आपको इस विधा के पेशेवर लोगों को अपने साथ लेकर कराने होते हैं। स्टिंग करनेवाले पेशेवर लोग इस काम में अत्याधुनिक और महंगे उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। ये पेशेवर लोग न्यूज चैनलों से स्टिंग किए जानेवाले मामले की औकात देखकर फिर उसके हिसाब से ही पैसा मांगते हैं। स्टिंग करनेवाले पेशेवर लोग स्टिंग ऑपरेशन करने में काफी रिस्क भी लेते हैं। यह काफी मेहनत का काम है। इसीलिए वे मोटा पैसा भी मांगते हैं। इसलिए बढ़िया स्टिंग कराना थोड़ा महंगा बैठता है। अगर आपने स्टिंग करा लिया पर किसी कारण से पार्टी को ब्लैकमेल नहीं कर पाए तो फिर स्टिंग की स्टोरी चैनल पर दिखाकर खूब वाहवाही बटोरिए और टीआरपी बढ़ाइए जिससे आपके चैनल की भी साख बढ़ेगी।

– गणेश प्रसाद झा

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