शनिवार, 9 अप्रैल 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 12


एक पत्रकार की अखबार यात्रा की बारहवीं किश्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 12


25, पंजाबी संपादक का हिन्दी पट्टी से बैर

चंडीगढ़ जनसत्ता में हमारे स्थानीय संपादक जितेंद्र बजाज (जितेंद्र कुमार बजाज) कई मामलों में बहुत ही अहंकारी और काफी बायस्ड इंसान थे। बजाज जी पंजाब के थे। वे हिंदी पट्टी के लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। उन्हें सिर्फ पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के लोग ही अच्छे लगते थे। ज्ञान, भाषा शैली और समझदारी भी उन्हें उन राज्यों के लोगों की ही अच्छी लगती थी। उनका मानना था कि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को अंग्रेजी तो नहीं ही आती, हिंदी भी ठीक से नहीं आती। वे कई बार अपनी इस दुर्भावना का खुलेआम बोलकर इजहार भी किया करते थे। पर वे मध्य प्रदेश के लोगों की भाषा को लेकर कभी कुछ नहीं बोलते थे। इसका एक मात्र कारण था कि हमारे प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी मध्य प्रदेश के थे। प्रभाष जोशी जी ने पत्रकारिता भी अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश से ही शुरू की थी। प्रभाष जी इंदौर के प्रतिष्ठित अखबार नई दुनिया के बहुचर्चित पत्रकार रहे थे। हिन्दी भाषा के मामले में नई दुनिया एक मानक अखबार माना जाता है। इसलिए मध्य प्रदेश और वहां के लोगों की भाषा पर कोई टिप्पणी करने की जितेंद्र बजाज जी की कभी हिम्मत नहीं होती थी। जितेंद्र बजाज पंजाब के मुक्तसर जिले के गिद्दड़बाहा के रहनेवाले थे और इसलिए पंजाबियों की अंग्रेजी और हिंदी भाषा की उनकी समझ को ही वे सर्वश्रेष्ठ मानते थे। बाकी हरियाणा और हिमाचल के लोगों से उन्हें कभी कोई शिकायत नहीं रहती थी। इसलिए बिहार के हम दो पत्रकार- मैं और प्रियरंजन भारती शुरू से ही उनके निशाने पर आ गए। लखनऊ के राजीव मित्तल से भी उनका अक्सर पंगा होता रहता था। छोटी-छोटी बातों पर दोनों की अक्सर भिड़ंत हो जाती थी। यह भिड़ंत दफ्तर से लेकर उनके घर तक भी जारी रहती थी। पर राजीव मित्तल उन्हें कभी हावी नहीं होने देते थे। राजीव मित्तल नवभारत टाइम्स के लखनऊ संस्करण से आए थे। प्रभाष जी ने उनको मुख्य उप संपादक की जिम्मेदारी दे रखी थी।

प्रभाष जोशी जी ने चंडीगढ़ में हम सबको काफी ठोक-बजाकर नौकरी पर रखा था। हममें से हर कोई कहीं न कहीं से अखबार की जमी-जमाई नौकरी छोड़कर ही चंडीगढ़ जनसत्ता आया था। पर जितेंद्र बजाज जी अपने अहंकार और गुरूर में प्रभाष जी को सुपरसीड करते हुए उनके चयन को कबाड़ा बताने लगे थे। दरअसल, जितेंद्र बजाज ही पत्रकारिता के लिए एक कबाड़ थे। उनको पत्रकारिता का रत्ती भर का भी अनुभव नहीं था। वे फिजिक्स में पीएचडी थे और विद्वान थे। अखबारों में कभी-कभार लेख लिखा करते थे। वह भी जनसत्ता का संपादक बनने के बाद। बस यही उनकी कुल जमा पत्रकारिता थी। वे न्यूज के आदमी बिल्कुल ही नहीं थे। और अखबार के लिए न्यूज का आदमी होना पहली शर्त होती है। कोई भी वैज्ञानिक, फिजिसिस्ट, रसायनशास्त्री, गणितज्ञ, फिजिसियन, कॉर्डियोलॉजिस्ट या साहित्यकार किसी अखबार का सफल पत्रकार या संपादक नहीं हो सकता। सबकी महत्ता अपनी-अपनी जगह पर है। सभी अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं।

चंडीगढ़ जनसत्ता का स्थानीय संपादक इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह को बनाना तय कर लिया गया था, पर जब उन्होंने अंतिम क्षणों में चंडीगढ़ नहीं जाने का फैसला कर लिया और कुछ समय तक मान-मनव्वल करने के बाद भी जब वे आने को राजी नहीं हुए तब जाकर आनन-फानन में जितेंद्र बजाज को नियुक्त कर लिया गया। बजाज जी की तो मानो लॉटरी लग गई। न कोई टेस्ट, न कोई कसौटी। न पत्रकारिता का कोई अनुभव। बस रख लिए गए और बना दिए गए स्थानीय संपादक। चंडीगढ़ जनसत्ता के हमारे समाचार संपादक देवप्रिय अवस्थी स्थानीय संपादक के लिए सबसे योग्य व्यक्ति थे। अगर उन्हें स्थानीय संपादक बना दिया गया होता तो वे वहां जनसत्ता को बुलंदियों पर ले गए होते और अखबार की ऐसी गत कभी न हुई होती जो जितेंद्र बजाज जी ने अपने आने के थोड़े ही दिनों में बना दी। देवप्रिय अवस्थी जी में अखबार के कामकाज की गजब की क्षमता थी और उन्हें इसका काफी लंबा अनुभव भी था। वे जनसत्ता के सांचे में पूरी तरह से ढले हुए व्यक्ति भी थे।      

प्रधान संपादक प्रभाष जोशी ने स्थानीय संपादक जितेंद्र बजाज को चंडीगढ़ जनसत्ता के कामकाज के मामले में फ्री हेंड दे दिया था। हमारी नियुक्ति के समय तो कोई स्थानीय संपादक था ही नहीं। जितेंद्र बजाज तो बहुत बाद में आए थे। पर आते ही उन्होंने खुद को मिले इस फ्री हेंड अधिकार का बेजा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वे अपनी लाइन बड़ी करने के लिए प्रधान संपादक को कुछ करके दिखाना चाहते थे। सो उन्होंने मुझे और प्रियरंजन भारती को बात-बात में नीचा दिखाना और निकम्मा साबित करने का प्रयास करना शुरू कर दिया। उन्होंने कई बार प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी को यह लिख भेजा कि गणेश प्रसाद झा और प्रियरंजन भारती को काम नहीं आता और इनकी हिंदी और अंग्रेजी दोनों बेकार है। बार-बार ऐसी चिट्ठी भेज-भेजकर वे प्रधान संपादक की नजर में हम दोनों को नकारा साबित करते रहे। हमारे बारे में कोई फैसला करने से पहले प्रभाष जी एक बार चंडीगढ़ आए और डेस्क पर बैठकर चुपचाप हम दोनों की कॉपियां अपनी स्टाइल में देख भी गए। उन्हें वैसा कुछ देखने को नहीं मिला जैसा जितेंद्र बजाज जी उनको बार-बार फीड कर रहे थे। हमलोग सभी उस समय छह-चह महीने के प्रोबेशन पर चल रहे थे। जितेंद्र बजाज ने हम दोनों को छह महीने के इस प्रोबेशन पीरियड के अंदर ही निकाल देने की योजना बना रखी थी। पर प्रभाष जी हम दोनों का काम आकर अपनी आंखों देख गए थे सो वे हमें नौकरी से हटाने के वारंट पर दस्तखत करने को राजी नहीं हुए। लिहाजा छह महीने का हमारा प्रोबेशन पीरियड खुशी-खुशी गुजर गया। हम अपनी कनफर्मेशन का इंतजार करने लगे। पर हमें कनफर्मेशन की चिट्ठी नहीं दी गई। इसके बाद हम दोनों को दिनांक- 20-10-1987 को जारी एक चिट्ठी दी गई जिसमें हमारा प्रोबेशन पीरियड और दो महीनों को लिए बढ़ा दिया गया। नियुक्ति वाला हमारा छह महीने का पहला प्रोबेशन दिनांक- 22-10-1987 तक का था। इसे और दो महीनों के लिए बढा दिया गया। इस तरह कनफर्मेशन की चिट्ठी मिलने का हमारा इंतजार फिलहाल खत्म हो गया। हम सोचने लगे कि अब दो महीने बाद ही हमें कनफर्मेशन की चिट्ठी दी जाएगी।

इस बीच, जितेंद्र बजाज ने प्रभाष जोशी को हमारे खिलाफ कान भरने और हमें नकारा साबित करते रहने का अपना अभियान भी जारी ही रखा। आखिरकार प्रभाष जोशी जी ने जितेंद्र बजाज की बात मान ली और हमें हटाने के वारंट पर हस्ताक्षर कर दिया। बस फिर क्या था, हमें दिनांक- 23-12-1987 को एक चिट्ठी दी गई जिस पर दिनांक- 23-11-1987 की तारीख पड़ी थी। यानी वह चिट्ठी एक महीने पहले ही जारी हुई थी और हमें एक महीने बाद दी गई। यह हमें नौकरी से निकाले जाने की चिट्ठी थी। इस चिट्ठी में लिखा था कि हमारी नौकरी दिनांक- 23-12-1987 से समाप्त कर दी गई है। बाद में मैंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में लेबर लॉ के मामले देखनेवाले एक जानकार वकील से इस बारे में पूछा था तो उन्होंने बताया था कि आप किसी नौकरी में अगर 6 महीने का प्रोबेशन पीरियड सकुशल पार कर लेते हैं और इस अवधि के बाद भी वहां नौकरी में बने रहते हैं यानी 6 महीने के प्रोबेशन से एक-दो दिन भी ज्यादा काम कर लेते हैं तो फिर 6 महीने की इस प्रोबेशन अवधि के बाद प्रबंधन को आपको कनफर्म करना ही पड़ेगा। यह कानून है। पर हमें तो आठ महीने की नौकरी पूरी कर लेने के बाद सेवा मुक्त कर दिया गया। मैं इस हालत में बिल्कुल नहीं था कि कंपनी से कोई मुकदमा लड़ता। फिर यह सब शोभा भी नहीं देता क्योंकि प्रभाषजी मेरे लिए पूजनीय थे और रहे।

26. खुद को बताया बेकसूर

जनसत्ता की नौकरी से निकाले जाने के दो दिन बाद चंडीगढ़ छोड़ने से पहले मैं एक दिन सुबह-सुबह अपने संपादक जितेंद्र बजाज जी से मिलने उनके घर गया। बजाज जी उन दिनों अकेले ही रहते थे। बैठकखाने में टेबल पर शहर के सारे अखबार ऱखे थे और एक चाय से भरा थर्मस रखा था जो एक मोटे कंबलनुमा कपड़े के कवर से ढका हुआ था। मुझे लगा कि थोड़ी ही देर पहले उन्होंने चाय पी थी। हमारी बातचीत शुरू हुई तो थोड़ी लंबी चली। उन्होंने मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे में पूछा। मैंने उन्हें अपनी पारिवारिक स्थिति और गरीबी बता दी और कहा कि मेरे लिए नौकरी करना कितना जरूरी है। बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे आग्रह करके दो बार चाय पिलाई। बजाज जी बोले, मन में कुछ मत रखना। यह मत समझना कि मैंने ही तुमलोगों को नौकरी से निकाला है। तुमलोगों को निकालने का फैसला तो बहुत पहले ही हो गया था। पर मैं चाहता था कि तुम दोनों (मैं और प्रियरंजन भारती) खुद ही नौकरी छोड़ दो। पर तुमलोगों ने जब इस्तीफा नहीं दिया तो मुझे तुम दोनों को टर्मिनेशन लेटर देकर निकालना पड़ा। बातचीत में बजाज जी ने मुझे यह समझाने की खूब कोशिश की कि नौकरी से निकाले जाने में उनका कहीं से कोई हाथ नहीं है। जो कुछ भी हुआ है, सब कुछ अखबार के प्रधान संपादक प्रभाष जी का ही किया हुआ है।

हम चंडीगढ़ से लौट आए। बाद में मैंने दिल्ली में रहकर फ्रीलांसिंग करने और नौकरी तलाशने का अभियान शुरू किया तो बहादुरशाह जफर मार्ग का एक्सप्रेस बिल्डिंग और वहां स्थित अन्य अखबारों के दफ्तरों में लगभग रोज ही जाने लगा और इस सिलसिले में प्रभाष जी से बहुत बार मिलना हुआ। उन मुलाकातों में खुद प्रभाष जी ने मुझे बताया कि वे मुझे और प्रियरंजन भारती को नौकरी से निकालने के पक्ष में बिल्कुल ही नहीं थे। पर जिंतेंद्र बजाज जी हमें निकालने पर अड़े हुए थे और उन्हें प्रभाषजी ने फ्री हेंड दे रखा था इसलिए अंत में न चाहते हुए भी दुखी मन से प्रभाष जी को हमें निकालने के फैसले को अपनी मंजूरी देनी पड़ी।

मेरे कैरियर का सर्वनाश करनेवाले जितेंद्र बजाज ज्यादा दिनों तक जनसत्ता में नहीं टिक पाए। चंडीगढ़ जनसत्ता के डेस्क और रिपोर्टिंग से लेकर प्रूफरीडिंग तक के कई साथियों के साथ भी उन्होंने दुर्व्यवहार किया। मेरे वहां से निकलने के कुछ समय बाद प्रदीप पंडित, सुधांशु मिश्र और नीलम गुप्ता भी चंडीगढ़ से दिल्ली आ गईं। सभी उनसे पीड़ित थे। इन कारणों से धीरे-धीरे उनका भी पाप का घड़ा भरता गया और थोड़े ही समय बाद उनको जनसत्ता छोड़ना पड़ा। उनके कामकाज के तरीकों और जनसत्ता के कर्मचारियों से उनके फूहड़ व्यवहार को लेकर काफी समय से खफा चल रहे प्रभाष जोशी जी ने उनसे इस्तीफा मांग लिया। जितेंद्र बजाज जी इसके बाद चेन्नई जाकर सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज से जुड़ गए। वे अभी उसके संस्थापक निदेशक हैं।

27. नॉन जर्नलिस्ट संपादक

जितेंद्र बजाज जनसत्ता के स्थानीय संपादक भले बना दिए गए, पर वे कहीं से भी पत्रकार नहीं हैं। उन्हें पत्रकारिता की कोई समझ नहीं है। हां, वे एक अच्छे विद्वान जरूर हैं। फिजिक्स से ऑनर्स करने के बाद थ्योरेटिकल फिजिक्स में उन्होंने पीएचडी किया है। जनसत्ता आने से पहले वे मद्रास विश्वविद्यालय में थ्योरेटिकल फिजिक्स के यूजीसी रिसर्च एसोसिएट, आईआईटी बंबई में ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंसेज विभाग में फिलॉसोफी ऑफ साइंस के रिसर्च फेलो, आईआईटी बंबई में फेलो ऑफ इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंसेज रिसर्च (आईसीएसएसआर) और दिल्ली में फेलो ऑफ सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग साइंसेज रहे। वे फिजिक्स के एक अच्छे विद्वान जरूर हो सकते हैं, पर जनसत्ता में आने से पहले पत्रकारिता में उनका कोई बॉयो नहीं रहा।

जितेंद्र बजाज डेस्क के कामकाज में बहुत अधिक और अनावश्यक दखल दिया करते थे। पर हिन्दी का उनका वाक्यविन्यास तक सही नहीं था। वे खबरों का फ्लो बिगाड़ देते थे। खबरों की अच्छी हेडिंग को भी वे खराब कर देते थे। पत्रकारिता में उनका पहले से कोई छोटा-मोटा योगदान भी नहीं था जिस कारण जनसत्ता में डेस्क के लोग, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के अच्छे अखबारों से आए पत्रकार भी उनको मूर्ख नजर आते थे। पंजाब के सारे पत्रकार उनको प्रिय थे और मध्य प्रदेश वाले उनको प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी के डर से अच्छे लगते थे। हरियाणा और हिमाचल के पत्रकार भी उनको अच्छे और समझदार ही लगते थे। उनके कामों में वे कभी कोई गलती नहीं निकालते थे। बजाज जी की नजर में वे सभी परफेक्ट थे। और बाकी लोग उनकी नजर में एकदम बेकार और नकारा थे। पत्रकारिता में जितेंद्र बजाज की इस नाकाबिलियत को जनसत्ता को हिन्दी पत्रकारिता के पटल पर लानेवाले कुछ बहुत बड़े पत्रकार भी मुक्त कंठ से स्वीकारते रहे हैं।

पत्रकारिता में जितेंद्र बजाज जी की इस नाकाबिलियत की वजह से चंडीगढ़ जनसत्ता को भी भारी नुकसान हुआ। हमने दिल्ली जनसत्ता के मंजे हुए समाचार संपादक और हिन्दी के जानेमाने पत्रकार देवप्रिय अवस्थी जी के नेतृत्व में काफी मेहनत से जनसत्ता चंडीगढ़ को पंजाब के बेहद मजबूत अखबार पंजाब केसरी के सामने खड़ा किया था। पर जितेंद्र बजाज जी ने आते ही अपने बेहद कड़वे व्यवहार और फिजिक्स के विद्वान होने का अपना अहंकार और गुरूर दिखा-दिखाकर पंजाब केसरी से लड़ने की हमारी ऊर्जा को शांत कर हमारे जुनून को ही धराशायी कर दिया। चंडीगढ़ में जनसत्ता को स्थापित करने का हमारा जुनून इस कदर मजबूत था कि 6 जुलाई 1987 को शाम ढलते ही जब समाचार एजेंसी ने चंडीगढ़ से महज 34 किलोमीटर दूर लालड़ू में सिख आतंकवादियों द्वारा एक रोडवेज बस से 38 हिन्दू मुसाफिरों को उतारकर गोलियों से भून देने की खबर आई तो नैनीताल से नौकरी करने चंडीगढ़ आए हमारे साथी रिपोर्टर जगमोहन फुटेला बिना किसी एसाइनमेंट के अपनी इच्छा से जान की परवाह किए वगैर फोटोग्राफर को साथ लेकर फौरन घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े और देर रात पेज छूटने से पहले खबर लेकर आ गए। यह हमारा जुनून ही तो था जो हम लोग शुरू के कई महीनों तक चंडीगढ़ के एक धर्मशाले में साथ मिलकर रहे और सुबह 10 बजे ही सभी दफ्तर पहुंच जाते थे और कई बार देर रात को अखबार छूटने के बाद ही लौटते थे। पर जितेंद्र बजाज जी की पत्रकारीय नाकाबिलियत ने सबकुछ चकनाचूर कर दिया।

मेरा करियर खराब करके मुझे सड़क पर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देने और इस तरह मेरे बच्चों का जीवन नष्ट करने में जितेंद्र बजाज जी का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने अपना और अपने परिवारजनों का भविष्य तो अच्छी तरह संवार लिया, पर मेरा और मेरे बच्चों का भविष्य चौपट कर दिया। मैं पटना के चर्चित अखबार पाटलिपुत्र टाइम्स की नौकरी छोड़कर चंडीगढ़ जनसत्ता गया था। जनसत्ता की नौकरी से निकाले जाने के बाद जब मैं वापस पाटलिपुत्र टाइम्स मैं नौकरी मांगने गया तो संपादक की इच्छा के वावजूद मुझे वहां मेनेजमेंट ने फिर से नौकरी पर लेने से साफ मना कर दिया क्योंकि मैं वहां से अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़कर आया था।

जितेंद्र बजाज जी का दंश मुझे लंबे समय तक झेलना पड़ा और मैं साल भर से भी अधिक समय तक पटना और दिल्ली की सड़कों पर धूल फांकता रहा। वे मेरे बड़े बुरे दिन थे। बहुत थोड़े समय के लिए दिल्ली की फ्लीट स्ट्रीट कही जाने वाली सड़क बहादुरशाह जफर मार्ग पर स्थित प्रताप भवन में वीर अर्जुन अखबार में मुख्य उप संपादक का काम करने का मौका मिला। पर वहां के प्रभारी संपादक (अनिल नरेंद्र नहीं) रोज शाम को शराब के नशे में धुत रहते थे और दफ्तर में खूब अंड-बंड बोलते थे। मैं उन्हें नहीं झेल सका और खुद नौकरी छोड़ दी। मैंने जितने दिन वहां काम किया था उसका वेतन भी उन्होंने मुझे मेनेजमेंट से दिलवाने से मना कर दिया था। अपनी आदतों की वजह से कुछ समय बाद ही वे दिवंगत हो गए।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....



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