शुक्रवार, 27 मई 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 22

 एक पत्रकार की अखबार यात्रा की बाइसवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 22

52. दिल्ली तबादला और कोऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी

ससून डॉक गेस्ट हाउस के गोदाम में आने के बाद से मैंने दिल्ली प्रभाषजी को कई बार मैसेज भेजकर उनकों वहां की स्थितियां बता दी थी और उनसे दिल्ली बुला लेने की प्रार्थना करता रहा था। प्रभाषजी ने मुझे बंबई भेजते समय कहा था कि थोड़े समय के लिए भेज रहा हूं। फिर दिल्ली बुला लूंगा। बंबई जनसत्ता में काम करते हुए करीब दो साल पूरे होनेवाले थे कि हमारे प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी बंबई दौरे पर आए। पहले भी कई बार आ चुके थे। पर इस बार आए तो मेरा ट्रांसफर उनके एजेंडे में शामिल था। मैं काफी समय से इसकी मांग भी कर रहा था, खासकर जब से राहुलजी ने ससून डॉक गेस्ट हाउस के फ्लैट से निकालकर हमें नीचे गंदे और टूट्-फूटे गोदाम में रहने के लिए भिजवा दिया था। प्रभाषजी को मैंने गोदाम की स्थितियों के बारे में भी बता रखा था। प्रभाषजी आए तो उन्होंने मुझे राहुलजी के कक्ष में ही बुलवा लिया। राहुलजी के सामने ही उन्होंने मुझे बता दिया कि वे मेरा ट्रांसफर दिल्ली कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं आपका ट्रांसफर दिल्ली कर रहा हूं। पर अपने राहुल जी तो कह रहे हैं कि गणेश झा बहुत अच्छा काम करते हैं इसलिए इनको यहीं रहने दीजिए। क्या करूं यहीं रहने दूं?” मैंने हाथ जोड़ कर उनसे कहा कि नहीं मुझे दिल्ली ही ले चलिए, यहां बहुत दिक्कत हो रही है। इसपर प्रभाषजी बोले, “ठीक है, मैंने आपका कर दिया है। आप जाने की तैयारी कर लीजिए।“ फिर प्रभाषजी राहुलजी को संबोधित करते हुए बोले, “मैंने दिल्ली में गणेश झा की जिम्मेदारी तय कर दी है। ये वहां जनसत्ता के सभी संस्करणों के बीच कोऑर्डिनेशन का काम देखेंगे।“ फिर क्या था, अगले दिन मुझे दिल्ली तबादले की चिट्ठी मिल गई। इस तरह करीब दो साल बंबई में रहने के बाद मेरी दिल्ली वापसी का मुहूर्त बना

बंबई जनसत्ता से दिल्ली ट्रांसफर की चिट्ठी लेने के बाद मैं वहां से रिलीव हो गया और मुझे सात दिनों की ट्रांसफर लीव भी मिल गई। मैंने बंबई दफ्तर से ट्रांसफर एडवांस भी ले लिया। बंबई में तो कभी ठंड होती नहीं पर दिसंबर का महीना था और दिल्ली में उन दिनों काफी ठंड थी। मेरे पास एक भी गर्म कपड़ा नहीं था। जो कुछ मैं दिल्ली से लेकर बंबई आया था उसे बाद में अपने गांव छोड़ आया था। लिहाजा मैंने कोलाबा सर्किल पर मॉल नुमा एक बड़े स्टोर से दो ऊनी स्वेटर, एक मफलर, एक ऊनी लोई और दो कंबल खरीदा था। बंबई के स्टोरों में ऐसे ऊनी कपड़े बंबई से बाहर ठंडे शहरों-इलाकों में जानेवाले लोगों के लिए ही होती हैं। मुझे चर्च गेट से चलनेवाली पंजाब मेल में आरक्षण मिला था। गेस्ट हाउस छोड़ते समय रविराज ने कहा था, "जितनी जिल्लत पिछले कुछ समय में यहां इस गंदे गोदाम में रहकर हमने भोगी है इसे कभी भूलना नहीं और कभी बंबई की तरफ मुंह करके पेशाब भी मत करना।" रविराज ने यह भी कहा था कि अब बहुत जल्द वह भी कंपनी का यह गेस्ट हाउस छोड़कर कहीं और रहने चले जाएंगे। जनसत्ता डेस्क के एक साथी मुझे ट्रेन पर बिठाने चर्च गेट स्टेशन तक आए थे।

53. जयप्रकाश शाही का इस्तीफा और उनकी भविष्यवाणी

बंबई जनसत्ता जाने पर मालूम हुआ कि सथानीय संपादक राहुल देव जी शायद दिसंबर 1988 में बंबई जनसत्ता आए थे। उनके पहले जयंत मेहता को जनसत्ता के बंबई संस्करण का स्थानीय संपादक बनाया गया था। पर जयंत मेहता करीब दो महीने ही वहां रहे। उनके बाद दिल्ली से समाचार संपादक अच्युतानंद मिश्र को बंबई भेजा गया था। जयंत मेहता के समय में ही प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी ने जनसत्ता के लखनऊ में उत्तर प्रदेश राज्य ब्यूरो प्रमुख जय प्रकाश शाही को बंबई भेजा था। उन्हें वहां रिपोर्टिंग की कमान सौंपी गई थी। शाही जी राहुलजी को बहुत अच्छी तरह जानते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों लखनऊ के ही रहनेवाले थे। जैसे ही राहुलजी ने बंबई संस्करण के स्थानीय संपादक का कार्यभार संभाला, शाही जी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। जनसत्ता बंबई के कई साथी बताया करते थे कि लखनऊ लौटने से पहले शाही जी बंबई जनसत्ता के कुछ साथियों से कह गए थे कि प्रभाषजी ने राहुलजी को जनसत्ता में लाकर अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है। राहुलजी एक नंबर के धूर्त, धोखेबाज, चालाक और मक्कार व्यक्ति हैं। राहुलजी आनेवाले दिनों में प्रभाषजी का पत्ता काट देंगे। और वह समय भी जल्दी ही आनेवाला है। जय प्रकाश शाही जी की यह बात एक भविष्यवाणी थी। शाही जी अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी यह भविष्यवाणी कुछ ही साल बाद सही साबित हो गई। (इसे आप आगे पढ़ेंगे।)

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....


गुरुवार, 26 मई 2022

ऐसा था अकबर महान का असली इतिहास!

 ऐसा था अकबर महान का असली इतिहास!

बादशाह अकबर महान के असली चरित्र और उसके इतिहास को जानना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए कि अकबर के बारे में हमने इतिहास में जो कुछ भी पढ़ा है वह सच नहीं है। सच तो कुछ और ही है। और यही सच अकबर का असली इतिहास है जिसे सबको जानना चाहिए।

आइए देखते हैं वह इतिहास क्या कहता है। 

अकबर के समय के इतिहासकार अहमद यादगार ने लिखा है-

“बैरम खां ने निहत्थे और बुरी तरह घायल हिन्दू राजा हेमू के हाथ पैर बाँध दिये और उसे नौजवान शहजादे के पास ले गया और बोला, आप अपने पवित्र हाथों से इस काफिर का कत्ल कर दें और”गाज़ी”की उपाधि कुबूल करें और शहजादे ने उसका सिर उसके अपवित्र धड़ से अलग कर दिया।” (नवम्बर, 5 AD,1556)

(तारीख-ई-अफगान, लेखक- अहमद यादगार, अनुवाद- एलियट और डाउसन, खण्ड VI, पृष्ठ संख्या- 65-66)

इस तरह अकबर ने 14 साल की उम्र में ही 

गाज़ी (काफिरों का कातिल) होने का सम्मान पा लिया। इसके बाद हेमू के कटे सिर को उसने काबुल भिजवा दिया और धड़ को दिल्ली के दरवाजे पर ले जाकर टांग दिया।

अबुल फजल ने आगे लिखा – ”हेमू के पिता को जीवित ले आया गया और नासिर-उल-मलिक के सामने पेश किया गया जिसने उसे इस्लाम कबूल करने का आदेश दिया, किन्तु उस वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, ”मैंने अस्सी वर्ष तक अपने ईश्वर की पूजा की है। मैं अपने धर्म को कैसे त्याग सकता हूं?

मौलाना परी मोहम्मद ने उसके जवाब को अनसुना कर अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया।”

(अकबर नामा, लेखक- अबुल फजल, अनुवाद-  एलियट और डाउसन, पृष्ठ संख्या- 21)

इस विजय के तुरन्त बाद अकबर ने काफिरों के कटे हुए सिरों से एक ऊंची मीनार बनवाई। 2 सितम्बर 1573 को भी अकबर ने अहमदाबाद में 2000 गैर मुस्लिमों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊंची सिरों की मीनार बनवाई और अपने दादा बाबर का रिकार्ड तोड़ दिया यानी घर का रिकार्ड घर में ही रहा।

अकबरनामा के अनुसार 3 मार्च 1575 को अकबर ने बंगाल विजय के दौरान इतने गैर मुस्लिम सैनिकों और नागरिकों की हत्या करवायी कि उससे कटे सिरों की आठ मीनारें बनायी गयीं। यह फिर से एक नया रिकार्ड था। जब वहां के हारे हुए शासक दाऊद खान ने मरते समय पानी मांगा तो उसे जूतों में भरकर पानी पीने के लिए दिया गया।

अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने लिखा था- ”अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000 राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद सुबह से दोपहर तक अन्य 40000 किसानों का भी वध कर दिया गया जिनमें 3000 बच्चे और बूढ़े थे।”

(अकबरनामा, लेखक- अबुल फजल, अनुवाद - एच. बैबरिज)

चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी जयमाल मेतावाड़िया समेत 12000 क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में खुद को जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीख-पुकार के बीच उसमें कूदती 12000 महिलाएं।

अपने हरम को धनी संपन्न करने के लिए अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ जबरन शादियां की थी।

 परन्तु कभी भी किसी मुगल महिला को हिन्दू से शादी नहीं करने दी। केवल अकबर के शासनकाल में 38 राजपूत राजकुमारियां शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं। 12 अकबर को, 17 शाहजादा सलीम को, छह दानियाल को, 2 मुराद को और 1 सलीम के पुत्र खुसरो को।

अकबर की गंदी नजर गौंडवाना की विधवा रानी दुर्गावती पर थी।। ”सन् 1564 में अकबर ने अपनी हवस की शांति के लिए रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया। पर एक वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद अपनी हार निश्चित देखकर रानी ने अपनी ही छाती में छुरा घोंपकर आत्म-हत्या कर ली। किन्तु उसकी बहिन और पुत्रवधू को बन्दी बना लिया गया और अकबर ने उसे अपने हरम में ले लिया। उस समय अकबर की उम्र 22 वर्ष और उनकी आयु 40 वर्ष थी।”

(दी मुगल ऐम्पायर, लेखक- आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII)

सन् 1561 में आमेर के राजा भारमल और उनके 3 राजकुमारों को यातना दे कर उनकी पुत्री को साम्बर से अपहरण कर अपने हरम में आने को मज़बूर किया। स्त्रियों का झूठा सम्मान करने वाले अकबर ने सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए न जाने कितनी मुस्लिम औरतों की भी अस्मत लूटी थी। इसमें मुस्लिम औरत चांद बीबी का नाम भी है। अकबर ने अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहाँगीर के शासन काल में हुई।

सबसे मनगढ़ंत किस्सा कि अकबर ने दया करके सतीप्रथा पर रोक लगाई; जबकि इसके पीछे उसका मुख्य मकसद केवल यही था कि राजवंशीय हिन्दू नारियों के पतियों को मरवाकर एवं उनको सती होने से रोककर अपने हरम में डालकर एेय्याशी करना।

राजकुमार जयमल की हत्या के पश्चात अपनी प्रतिष्ठा सम्मान अस्मत इज्जत बचाने को घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही उसकी पत्नी को अकबर ने रास्ते में ही पकड़ लिया। श्मशान घाट जा रहे उसके सारे सम्बन्धियों को वहीं से कारागार में सड़ने के लिए भेज दिया और राजकुमारी को अपने हरम में ठूंस दिया। इसी तरह पन्ना के राजकुमार को मारकर उसकी विधवा पत्नी का अपहरण कर अकबर ने अपने हरम में ले लिया।

अकबर औरतों के लिबास में मीना बाज़ार जाया करता था जो हर नए साल की पहली शाम को लगता था। अकबर अपने दरबारियों को अपनी स्त्रियों को वहां सज-धज कर भेजने का आदेश देता था। मीना बाज़ार में जो औरत अकबर को पसंद आ जाती, उसके महान फौजी उस औरत को उठा ले जाते और कामी अकबर की अय्याशी के लिए हरम में पटक देते।

 अकबर महान उन्हें एक रात से लेकर एक महीने तक अपनी हरम में खिदमत का मौका देते थे। जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम की औरतें जानवरों की तरह महल में बंद कर दी जाती थीं।

अकबर ने अपनी अय्याशी के लिए इस्लाम का भी दुरुपयोग किया था। चूंकि सुन्नी फिरके के अनुसार एक मुस्लिम एक साथ चार से अधिक औरतें नहीं रख सकता और जब अकबर उससे अधिक औरतें रखने लगा तो काजी ने उसे रोकने की कोशिश की। इस से नाराज होकर अकबर ने उस सुन्नी काजी को हटा कर शिया काजी को रख लिया क्योंकि शिया फिरके में असीमित और अस्थायी शादियों की इजाजत है , ऐसी शादियों को अरबी में “मुताह” कहा जाता है।

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है-

“अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थीं। शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था। वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी। अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी। कई बार सुन्दर लड़कियों को ले जाने के लिए लोगों में झगड़ा भी हो जाता था। 

एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”।

बैरम खान जो अकबर के पिता जैसा और संरक्षक था।उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात् अपनी माता के समान औरत से शादी की। इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य में रहने वाले गैर-मुस्लिमों को अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से बचाने के लिए इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया-कर कहते थे। 

कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था। किन्तु, इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त रखी गयी थी।

रणथम्भौर की सन्धि में बूंदी के सरदार को शाही हरम में औरतें भेजने की “रीति” से मुक्ति देने की बात लिखी गई थी। जिससे बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने युद्ध में हारे हुए हिन्दू सरदारों के परिवार की सर्वाधिक सुन्दर महिला को मांग लेने की एक परिपाटी बना रखी थीं और केवल बूंदी ही इस क्रूर रीति से बच पाया था। यही कारण था की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियों के जौहर की आग में जलने की हजारों घटनाएं हुईं।।

जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ”डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” में अकबर को ‘महान’ कहकर उसकी प्रशंसा की है। हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।

अकबर के दादा बाबर का वंश तैमूरलंग से था और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। इस प्रकार अकबर की नसों में एशिया की दो प्रसिद्ध आतंकी और खूनी जातियों, तुर्क और मंगोल के रक्त का सम्मिश्रण था। जिसके खानदान के सारे पूर्वज दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद थे और अकबर के बाद भी जहाँगीर और औरंगजेब दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे थे तो ये बीच में महानता की पैदाइश कैसे हो गयी?

अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है कि-

" अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंस-हत्याकांड करने वाला क्रूर शासक था।

विन्सेंट स्मिथ ने किताब ही यहां से शुरू की है कि-  “अकबर भारत में एक विदेशी था! उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था। अकबर मुग़ल से ज्यादा एक तुर्क था”।

चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे। जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित हो गई थी।

उनमें से एक फतहनामा पढ़िए-

”अल्लाह की ख्याति बढ़े,, इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया।

 ”हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद एक अरबी शब्द अर्थात् धर्म युद्ध अर्थ गैर मुस्लिमों का छल कपट से कटाई और गैर मुस्लिम स्त्रियों को वेश्या बनाना) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है। कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।”

(फतहनामा-ई-चित्तौड़ मार्च 1586,नई दिल्ली।)

महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर के अभियानों के लिए सबसे बड़ा प्रेरक तत्व था इस्लामी जिहाद की भावना जो उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी हुई थी।

अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाऊनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि 1576 में जब शाही फौजें राणाप्रताप के खिलाफ युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो मैनें (बदाउनीने) ”युद्ध अभियान में शामिल होकर हिन्दुओं के रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगोंकर शाहंशाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।”मेरे व्यक्तित्व और जिहाद के प्रति मेरी निष्ठा भावना से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होनें प्रसन्न होकर मुझे मुठ्ठी भर सोने की मुहरें दे डालीं।” (मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड-II, पृष्ठ 383, अनुवाद वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ 108)

बदाउनी ने हल्दी घाटी के युद्ध में एक मनोरंजक घटना के बारे में लिखा था-

”हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर की सेना से जुड़े राजपूत, और राणा प्रताप की सेना के राजपूत जब परस्पर युद्धरत थे और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब मैनें शाही फौज के अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु ही मरे।

तब कमाण्डर आसफ खां ने उत्तर दिया कि यह जरूरी नहीं कि गोली किसको लगती है क्योंकि दोनों ओर से युद्ध करने वाले काफिर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा।”

(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी,

खण्ड-II, अनुवाद- अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित 1962; हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर :आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ संख्या- 132, तृतीय संस्करण)

जहांगीर ने अपनी जीवनी ”तारीख-ई-सलीमशाही” में लिखा था कि  "अकबर और जहाँगीर के शासन काल में पाँच से छह लाख की संख्या में अकबर की ओर से लड़ाई करने वाले हिन्दुओं का वध हुआ था। क्योंकि वे गैर मुस्लिम थे।"

(तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ 225-226)।

जून 1561- एटा जिले के (सकित परंगना) के 8 गावों की हिंदू जनता के विरुद्ध अकबर ने खुद एक आक्रमण का संचालन किया और परोख नाम के गाँव में मकानों में बंद करके 1000 से ज़्यादा हिंदुओं को जिंदा जलवा दिया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनके इस्लाम कबूल ना करने के कारण ही अकबर ने क्रुद्ध होकर ऐसा किया।

थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु (हरियाणा) और पुरी (उड़ीसा) के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था। अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले। उन मूर्ख लोगों ने आपस में ही अस्त्र-शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी। जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया  और अंत में इसने दोनों ही तरफ के लोगों को अपने सैनिकों से मरवा डाला और फिर अकबर महान जोर से हंसा।

एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है। इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को मीनार से नीचे फिंकवा दिया।

अगस्त 1600 में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था।विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा। उसने किले के राजा मीरां बहादुर को संदेश भेजकर अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा। जब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया तो उसे अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुकने का आदेश दिया गया क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था।

उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे। मीराँ के सेनापति ने इसे मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने उसके बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए उसका पिता समर्पण नहीं करेगा। यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया। यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है।

हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया। असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर 36 शादियां करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि इस्लाम के लिए हराम है और इसीलिए इसके नाम की मस्जिद भी हराम है।

अकबर स्वयं पैगम्बर बनना चाहता था इसलिए उसने अपना नया धर्म “दीन-ए-इलाही – ﺩﯾﻦ ﺍﻟﻬﯽ ” चलाया। जिसका एकमात्र उद्देश्य खुद की बड़ाई करवाना था। यहाँ तक कि मुसलमानों के कलमें में यह शब्द “अकबर खलीफतुल्लाह – ﺍﻛﺒﺮ ﺧﻠﻴﻔﺔ ﺍﻟﻠﻪ ” भी जुड़वा दिया था।

उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में अस्सलाम वालैकुम नहीं बल्कि “अल्लाह ओ अकबर” कहकर एक दूसरे का अभिवादन किया जाए। यही नहीं अकबर ने हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए एक फर्जी उपनिषद् “अल्लोपनिषद” बनवाया था जिसमें अरबी और संस्कृत मिश्रित भाषा में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल और अकबर को खलीफा बताया गया था। इस फर्जी उपनिषद् का उल्लेख महर्षि दयानंद ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में किया है।

उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया। जबकि वास्तविकता ये है कि उस धर्म को मानने वाले अकबरनामा में लिखित कुल 18 लोगों में से केवल एक हिन्दू था बीरबल।

अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले। जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है। अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी। उसके दरबारियों को तो इसलिए अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए। अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग उसे पसंद नहीं हैं।

अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कत्ल कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब जो इसे नापसंद थे। पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है।

अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी गढ़ी। पर असलियत यह है कि अकबर अपने सभी दरबारियों को मूर्ख समझता था। उसने खुद कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि उसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं।

अकबरनामा के एक उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि उसके हिन्दू दरबारियों का प्रायः अपमान हुआ करता था। ग्वालियर में जन्में संगीत सम्राट रामतनु पाण्डेय उर्फ तानसेन की तारीफ करते-करते मुस्लिम दरबारी उसके मुँह में चबाया हुआ पान ठूंस देते थे। भगवन्त दास और दसवंत ने सम्भवत: इसीलिए आत्महत्या कर ली थी।

प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था। इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना। वफादार होने के बावजूद अकबर ने एक दिन नाराज होकर उसकी पूजा की मूर्तियां तुड़वा दी थी। जिन्दगी भर अकबर की गुलामी करने के बाद टोडरमल ने अपने जीवन के आखिरी समय में अपनी गलती मान कर दरबार से इस्तीफा दे दिया और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्राण त्यागने की इच्छा से वाराणसी होते हुए हरिद्वार चला गया और वहीं उसकी मौत हुई।

लेखक और नवरत्न अबुल फजल को स्मिथ ने अकबर का अव्वल दर्जे का निर्लज्ज चाटुकार बताया। बाद में जहांगीर ने इसे मार डाला। फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी।

बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया। बीरबल-अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।ध्यान रहे कि ऐसी कहानियां दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से भी प्रचलित हैं। एक और रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों अकबर के आदेश पर मार डाला गया ।

मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था ने अपनी बेटी तो अकबर को  दे दी। जागीर के लालच में कई और राजपूत राजकुमारियों को तुर्क हरम में पहुंचाया। बाद में जहांगीर ने इसी मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया। मान सिंह ने पूरे राजपूताने के गौरव को कलंकित किया था। यहाँ तक कि उसे अपना आवास आगरा में बनाना पड़ा क्योंकि वो राजस्थान में मुंह दिखाने के लायक नहीं था। यही मानसिंह जब संत तुलसीदास से मिलने गया तो अकबर ने इस पर गद्दारी का संदेह कर दूध में जहर देकर मरवा डाला और इसके पिता भगवान दास ने लज्जित होकर आत्महत्या कर ली।

इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें, और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है। जल्लाद अकबर शराब और अफीम का इतना शौक़ीन था कि अधिकतर समय नशे में ही धुत रहता था।

अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हो गये।

हमारे फिल्मकार अकबर को सुन्दर और रोबीला दिखाने के लिए रितिक रोशन जैसे अभिनेता अकबर को फिल्मों में वैसा ही बनाकर पेश करते हैं परन्तु विन्सेंट स्मिथ अकबर के बारे में लिखते हैं-

“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था। उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था। उसका सिर अपने दाएं कंधे की तरफ झुका रहता था। उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी। उसके नाक के नथुने ऐसे दिखते थे जैसे वो गुस्से में हो। आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था।

अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात करते-करते भी नींद में गिर पड़ता था। वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलों जैसी हरकतें करने लगता था।

अकबर महान के खुद के पुत्र जहांगीर ने लिखा है कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है।

अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया। इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था। कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने 1581-82 में इसकी किसी नीति का विरोध किया था। बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए थे।

अकबर लोगों को बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था। उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे। फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाए या फिर अकबर की वित्तीय गुलामी क़ुबूल करे।

जब अकबर की मौत हुई थी तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियां केवल उसके आगरे के किले में थीं। इसी तरह के और खजाने छह और जगहों पर भी थे। इसके बावजूद भी उसने 1595-1599 की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया।

हमने पढ़ा है कि बादशाह अकबर सभी धर्मों का आदर करता था। बादशाह अकबर के सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव रखने का सबसे बड़ा सबूत देखिए -

अकबर ने तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम का तीर्थनगर “प्रयागराज” जो एक काफिर नाम था को बदलकर इलाहाबाद रख दिया था। वहां गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का उसने क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरवा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो वहां की हिन्दू जनता ने उसका इस्तकबाल नहीं किया। यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है। अकबर ने हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित संगम प्रयाग के किनारे के सारे घाट तुड़वा डाले थे। आज भी वो सारे साक्ष्य वहां मौजूद हैं।

28 फरवरी 1580 को गोवा से एक पुर्तगाली मिशन अकबर के पास पंहुचा और उसे बाइबिल भेंट की जिसे इसने बिना खोले ही वापस कर दिया। 4 अगस्त 1582 को इस्लाम को अस्वीकार करने के कारण सूरत के 2 ईसाई युवकों को अकबर ने अपने हाथों से कत्ल किया था जबकि ईसाईयों ने इन दोनों युवकों को छोड़ने के लिए 1000 सोने के सिक्कों का सौदा किया था। लेकिन उसने क़त्ल ज्यादा सही समझा ।

 सन् 1582 में बीस मासूम बच्चों पर भाषा परीक्षण किया और ऐसे घर में रखा जहां किसी भी प्रकार की आवाज़ न जाए और उन मासूम बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी और वो गूंगे होकर मर गये। यही परीक्षण दोबारा 1589 में बारह बच्चों पर किया ।

सन् 1567 में नगर कोट को जीत कर कांगड़ा देवी मंदिर की मूर्ति को खण्डित की और लूट लिया फिर गायों की हत्या कर के गौ-रक्त को जूतों में भरकर मंदिर की प्राचीरों पर छाप लगाई। जैन संत हरिविजय के समय सन् 1583-85 को जजिया-कर और गौ-हत्या पर पाबंदी लगाने की झूठी घोषणा की जिस पर कभी अमल नहीं हुआ।

एक अंग्रेज रूडोल्फ ने अकबर की घोर निंदा की।

कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ डाली और उस स्थान पर नमाज पढ़ी। 1587 में जनता का धन लूटने और अपने खिलाफ हो रहे विरोधों को ख़त्म करने के लिए अकबर ने एक आदेश पारित किया कि जो भी उससे मिलना चाहेगा उसको अपनी उम्र के बराबर मुद्राएं उसको भेंट में देनी पड़ेगी।

जीवन भर इससे युद्ध करने वाले महान महाराणा प्रताप जी से अंत में इसने खुद ही हार मान ली थी ।।यही कारण है कि अकबर के बार बार निवेदन करने पर भी जीवन भर जहांगीर केवल ये बहाना करके महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह से युद्ध करने नहीं गया कि उसके पास हथियारों और सैनिकों की कमी है..जबकि असलियत ये थी की उसको अपने बाप का बुरा हश्र याद था।

विन्सेंट स्मिथ के अनुसार अकबर ने मुजफ्फरशाह को हाथी से कुचलवा दिया। हमजबान की जबान ही कटवा डाली। मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं। उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरों पर अजीबोगरीब तरीकों से गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया।

मुग़ल आक्रमणकारी थे यह तो साबित हो चुका है। मुगल दरबार तुर्क एवं ईरानी शक्ल ले चुका था। कभी भारतीय न बन सका। भारतीय राजाओं ने लगातार संघर्ष कर मुगल साम्राज्य को कभी स्थिर नहीं होने दिया।

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रविवार, 22 मई 2022

पत्रकारिता की कंटिली डगर- 21

 एक पत्रकार की अखबार यात्रा की इक्कीसवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 21

48. डेस्क की गलती पर खुद को पीटनेवाले संपादक

एक्सप्रेस टॉवर्स के हमारे दफ्तर में उसी हॉल में हमारे ही बगल में गुजराती दैनिक समकालीन का भी डेस्क था और उसके संपादक का चेंबर भी वहीं था। समकालीन के संपादक थे हसमुख गांधी जो उस समय करीब 50-55 के रहे होंगे। हसमुखभाई थे तो काफी हसमुख और सहज व्यक्ति, पर उनमें एक खास तरह की बीमारी थी। डेस्कवालों की गलतियों के लिए वे खुद को ही सजा दिया करते थे। खुद को यह सजा वे अमूमन रोज ही दिया करते थे। जब भी उनके अखबार समकालीन में डेस्क के किसी फत्रकार की वजह से कोई गलती चली जाती थी तो वे गलती करनेवाले डेस्क के उस पत्रकार को अपने चेंबर में सामने बुलाकर पहले तो उसे खूब डांटते थे औऱ फिर गुस्से में लाल-पीले होकर खुद को ही थप्पड़ मारने लगते थे। वे गलती करनेवाले के सामने ही खुद के ही गालों पर अपने दोनों हाथों से तड़ातड़ दर्जनों थप्पड़ जड़ देते थे। और खुद को पीटने का उनका यह सिलसिला अमूमन रोज ही चलता था। शायद ही कोई ऐसा दिन होता था जब हसमुखभाई ने खुद को छप्पड़ न मारा हो। वे जब गुस्साते थे तो उनके स्टाफ में डर से कोई कुछ नहीं बोलता था। सबको डर होता था कि पता नहीं गांधीभाई कब किस बात पर खुद को पीटने लगें। शुरू में तो हमारे लिए एक आश्चर्यजनक घटना की तरह होती थी और कौतूहलवश हम भी गांधीभाई के कक्ष में झांककर उनको गुस्से में खुद को थप्पड़ मारते हुए देख लिया करते थे। पर धीरे-धीरे हमारी यह उत्सुकता खत्म हो गई और हमने उसे रोज का नाटक समझ लिया। हसमुखभाई इस तरह गुस्से में जब भी खुद को पीट रहे होते थे तो धाराप्रवाह पीटते चले जाते थे। उन्हें ऐसा करने से रोकने की जल्दी कोई हिम्मत भी नहीं कर पाता था। उनको शांत करने के लिए कई बार लोकसत्ता के स्थानीय संपादक अरुण टिकेकर दौड़कर उनके कक्ष में जाते थे। जनसत्ता के हमारे प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी जब बंबई हमारे दफ्तर आते थे और अगर वे वहां दफ्तर में होते थे तो उठकर गांधीभाई के पास चले जाते थे और उनको शांत करते थे। प्रभाषजी गांधीभाई से उम्र में थे तो 5 साल छोटे पर उनके जाते ही गांधीभाई गुस्सा धूक देते थे और शांत हो जाते थे। हसमुखभाई की यह हरकत एक प्रकार की मानसिक बीमारी थी जिसे चिकित्सा विज्ञान में ‘सेल्फ इंजुरी डिसऑर्डर’ या ‘बॉर्डरलाइन परसोनालिटी डिसऑर्डर’ कहते हैं। इसमें व्यक्ति को लगता है कि सारी समस्याओं की जड़ वह खुद ही है और सारी गलतियां उसकी खुद की वजह से ही हो रही हैं। और इस तरह वह दूसरों की गलतियों के लिए भी खुद को ही सजा देने लगता है।

49. बंबई शहर में शाम के अखबारों का क्रेज

बंबई शहर में सुबह के अखबारों से ज्यादा शाम के अखबारों का क्रेज दिखता था। सुबह के अखबारों के तो स्टॉल भी पहुत कम ही दिखाई देते थे। शाम के अखबार तो बिना स्टॉल के ही सड़क किनारे की पटरियों पर बस यूं ही रखकर बेच लिए जाते थे। इसी तरह लाखों प्रतियां बिक जाती हैं रोज की। नरीमन पॉइंट के इलाके और आसपास जहां बंबई के दफ्तरों का विशाल झुरमुट है वहां दिन के तीन बजे से ही शाम के अखबार बेचनेवाले पटरियों पर डेरा जमा लेते थे। शाम के 4 बजे से 6 बजे तक वहां के उन गगनचुंबी इमारतों के दफ्तरों से बाबुओं और कामगारों का जो समुद्र बाहर निकलता था तो पलक झपकते ही उन सांध्य दैनिकों की हजारों-हजार प्रतियों फुर्र हो जाती थीं। यह मानव रेला लोकल (लोकल ट्रेनें) पकड़ने चर्च गेट और वीटी की तरफ बहता दिखाई देने लगता था। उस रेले में लगभग हर एक के हाथ में होता था एक सांध्य अखबार। दरअसल ये बाबू लोग शाम का अखबार खबरों के लिए कम, लोकल में तीन-चार घंटे का समय काटने के लिए ज्यादा खरीदते थे। ये बाबू लोग सुबह 9 बजे नरीमन पॉइंट के अपने दफ्तर पहुंचने के लिए अपने घरों से 5 बजे ही निकल जाया करते हैं। ऐसे में वे सुबह का अखबार क्या खाक पढ़ पाएंगे। ये कामकाजी लोग सुबह का अखबार देर शाम घर लौटने के बाद ही देख पाते हैं।  पर लोकल का कई घंटों का उबाऊ सफर कैसे कटे इसके लिए ले लेते हैं शाम का अखबार। उन सांध्य दैनिकों में बंबई शहर में उस दिन कुछ बड़ा हुआ हो तो उसकी खबर, कुछ दूसरी चटपटी खबरें, कुछ फिल्मी दुनिया की खबरें और ताक धिनाधिन मार छुरा से ज्यादा कुछ नहीं होता था। फिर भी बिक्री लाखों में।

50. मदारी के तमाशों की तरह सड़कों पर शूटिंग

फिल्मों में कोई खास दिलचस्पी न होने की वजह से दो साल के अपने लंबे बंबई प्रवास के दौरान भी मैं फिल्मों की शूटिंग देखने या फिर फिल्मी दुनिया को करीब से जानने-समझने के लिए कभी किसी स्टूडियो में नहीं गया। हां, रात को नरीमन पॉइंट के अपने दफ्तर से निकल कर कोलाबा स्थित घर जाते हुए कई बार सड़कों, चौराहों और नुक्कड़ों पर फिल्मों की शूटिंग होती दिख जाती थी तो वहां कुछ देर रुक कर सबकुछ करीब से देख लिया करता था। इसी तरह फिल्मों की शटिंग के अधिकतर आयामों के बारे में धोड़ा-बहुत जान पाया। ये फिल्मोंवाले पर्दे पर चाहे जितने तामझामवाले और आकर्षक दिखें पर असलियत में ये लोग कभी भी-कहीं भी शुरू हो जाते हैं। अब दिन में तो सड़कों पर भारी ट्राफिक होता है, इसलिए ये शाम ढलने के बाद से लेकर पूरी रात चालू रहते हैं। पर हमें सड़कों पर होती  शूटिंग की इस नौटंकी को देखने के बाद यही समझ में आया कि इसमें असलियत पर झूठ का मुलम्मा कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जाता है। अगर आपने सड़क की शूटिंग देख ली तो फिर फिल्म देखने में आपको मजा नहीं आएगा।

बंबई में रहते हुए मैंने वहां शिवसेना की गुंडागर्दी और उनके द्वारा आयोजित होनेवाला राजनैतिक बंद को भी काफी करीब से देखा। शहर के बाजारों में दुकानें चलानेवाले कुछ व्यापारियों ने दबी जुबान में कबूला कि शिवसेना एक राजनैतिक दल कम, तोड़फोड़ करनेवाले आराजक गुंडों की पार्टी ज्यादा है। उन व्यापारियों का कहना था कि वे नहीं चाहते की बंद बुलाया जाए और उनका धंधा प्रभावित हो, पर तोड़फोड़ के डर से हमें शिवसेना का आदेश न चाहते हुए भी मानना पड़ता है और इस तरह डर के मारे शिवसेना का बंद जबरिया होकर भी स्फूर्त हो जाता है।

बंबई जनसत्ता में प्राण ढाबर्डे जी लोकल डेस्क पर स्टाफ रिपोर्टर थे और मनपा (महानगरपालिका) वही देखते थे। उन्होंने एक दिन डेस्क के तमाम साथियों से कहा कि जिन-जिन का यहां राशनकार्ड नहीं है वे अगर चाहेंगे तो उनका बंबई का राशनकार्ड बिना किसी परेशानी के बन जाएगा। हम जितने लाथी ससून डॉक गेस्ट हाउस में रहते थे सबने अपना राशन कार्ड बनवा लिया। कुछ और साथियों ने भी बनवाया। प्राण ढाबर्डेजी तीन-चार दिनों में ही सबका राशनकार्ड बनवा लाए थे। हमने तो सिर्फ सादे कागज पर एक आवेदन भर लिख कर दिया था। बस बन गया था राशनकार्ड। इसे कहते हैं अखबार का असर।

बंबई में ही मैंने नहाने का विदेशी साबुन देखा और इस्तेमाल किया। वहीं ससून डॉक गेस्ट हाउस में साथ रह रहे मेरे साथी पत्रकार सदानंद गोडबोले विदेशी साबुन के बड़े शौकीन थे। एक दिन वे एक विदेशी साबुन लेकर आए और नहाने के बाद उसकी खूब तारीफ करने लगे। अगले दिन उन्होंने मुझे भी वही साबुन खरीदवा दी। साबुन था लक्स इंटरनेशनल। पर वह भारत में बनी लक्स नहीं थी। उस साबुन की तासीर गजब की थी। वाकई तारीफ के काबिल। फिर मैंने एक दूसरा विदेशी साबुन फा भी इस्तेमाल किया। वह भी लाजवाब था। उन दिनों ये विदेशी साबुन भारत में नहीं बना करते थे। सदानंद विदेशी सिगरेटों के भी शौकीन थे। वहां वे अक्सर मार्लबोरो के पैकेट खरीद लाते थे। मैं सिगरेट नहीं पीता, पर मैंने विदेशी सिगरेट भी पहली बार वहीं देखी थी। मैं दिल्ली से बंबई गया था। उन दिनों राजधानी  दिल्ली में भी विदेशी साबुन और सिगरेट बंबई की तरह पान-सिगरेट बेचनेवाली गुमटियों और खोखों में नहीं बिक रहे होते थे।

 51. प्रोमोशन की चिट्ठी और खुन्नस की गांठ

 जनसत्ता बंबई में लगभग डेढ़ साल की नौकरी के बाद 1990 के मध्य में प्रोमोशन दिए जाने की चर्चा शुरू हुई। प्रोमोशन के इंतजार में कई लोग लाइन में थे। कई साथियों को लंबे समय से, शायद अखबार शुरू होने से पहले की गई शुरुआती भर्ती में ही जल्द प्रोमोट कर मांगा गया ओहदा और वेतन देने का वादा किया गया था जो अब तक नहीं मिला था। इसलिए जब प्रोमोशन जल्द होने की गूंज सुनाई दी तो कुंठित चल रहे लोगों की उम्मीदें एक बार फिर जग गईं। पर इसमें भी केवल चंद लोग ही किस्मतवाले साबित हुए। बाकी जिन्हें शुरू से ही यानी राहुलजी के स्थानीय संपादक पद पर आने से भी पहले से कह रखा गया था उनका भी नाम आखिरी वक्त में काट दिया गया। इसमें जो लोग जनसत्ता की नौकरी में आने से पहले और भी कई जगह अपनी सेवाएं दे चुके थे वे भी खाली हाथ रह गए।

प्रोमोशन बांटने में प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी ने राहुलजी को बिल्कुल फ्री हेंड दे रखा था। दिल्ली में तो सबकुछ निहायत नियंत्रित रहता था और आगे बढ़ने के मौके भी नहीं के बराबर होते थे। पर बंबई में खुला मामला था, भरपूर मौके भी थे और बंबई का स्लैब भी दिल्ली से कहीं ज्यादा था। दिल्ली की तरह ऐसे मामलों में स्थानीय संपादक के हाथ बंधे होने जैसी यहां कोई बात नहीं थी। फिर भी राहुलजी की प्रोमोशन लिस्ट में चंद लोग ही समा सके। मुझे उन्होंने सीनियर सब का ओहदा तो दिया पर कोई इन्क्रीमेंट नहीं दी। कुछ को ओहदा और इन्क्रीमेंट दोनों मिला। मैं उनकी आंखों में शुरू से ही खटक रहा था सो इतनी सजा तो मिलनी तय ही थी। मैं भी मुंह लगा तो था ही सो पतित बनकर मैंने एक दिन पूछ ही लिया कि फलां को दो इन्क्रीमेंट दिया तो मुझे क्यों नहीं दिया। अनुभव और काम के मामले में मैं कमतर तो हूं नहीं, फिर यह नाइंसाफी क्यों। मैंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मैं पिछले आठ सालों से डेस्क पर हूं और अबतक पांच अखबारों में काम कर चुका हूं। राहुलजी बोले, "मैं उनको आपसे ऊपर रखना चाहता हूं।" बाद साफ हो गई कि यह उसी खुन्नस का नतीजा था जो शरद पवार के कोऑपरेटिव बैंक पर लिए गए फैसले वाली उस खबर को दिल्ली भेज देने से पैदा हुआ था जिसपर उन्होंने कहा था कि वे एडिट लिखना चाह रहे थे। उन्होंने इस खुन्नस की तभी गांठ बांध ली थी और वह गांठ उन्होंने कभी खोली ही नहीं और उसे जनसत्ता से जाते समय अपने साथ ही लेते गए। तारीफ की बात है कि राहुलजी इतने साल तक उस खुन्नस को ढोते रहे और उन्हें यह भारी भी नहीं लगा।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....


रविवार, 15 मई 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 20

एक पत्रकार की अखबार यात्रा की बीसवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 20

46, स्थानीय संपादक की अखबारी समझ

हम पत्रकार हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम गलतियां नहीं करते। हमसे भी गलतियां होती हैं और रोज होती हैं। गलतियां मैंने भी की है और खूब की है। हम रोज कुआं खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं। यह हमारा रोज का काम होता है और हम पर खबरों का काफी दबाव भी होता है। फिर अखबार और उसके पन्नों के छूटने की डेडलाइन भी होती है जो काफी टाइट होती है। इसलिए हमें बहुत फास्ट मोड में काम करना होता है। ऐसे में गलतियां होना तो लिजिमी है। काम होगा तो गलतियां भी होंगी ही। पर ऐसी उम्मीद और अपेक्षा की जाती है कि डेस्क के लोग जब गलती करें तो समाचार संपादक और संपादक उसे पकड़ ले और अखबार में गलती छप जाने से बच जाए।

बंबई में हमारे इम्मेडियट बॉस हमारे स्थानीय संपादक राहुलजी ही थे। हम अपना फाइनल पेज उन्हें ही दिखाते थे। पर वे उसमें सिर्फ मात्राएं, कॉमा और फुलस्टॉप ही पकड़ पाते थे। एक बार हमारे साथी उप संपादक चंदर मिश्र ने किसी खिलाड़ी के संन्यास लेने की खबर की हेडिंग में संन्यास शब्द सही-सही लिखा पर राहुलजी उसे गलत ठहराने लगे और संन्यास शब्द को गलत तरह से लिखकर जाने देने पर अड़े रहे। अंत में उनको शब्दकोष दिखाना पड़ा। इसलिए जब भी हमसे कुछ ब्लंडर हो जाता था तो वह उनकी नजर में नहीं आ पाता था। उनके इस अल्प ज्ञान पर हम भी निश्चिंत रहते थे कि सुबह हमारी कोई क्लास नहीं लगनेवाली। अगली सुबह भी अखबार देखकर वे उस ब्लंडर को नहीं पकड़ पाते थे। खबरों के चुनाव और लीड खबर का चयन जैसे मामलों में वे कभी तर्क सहित अपनी अलग और मजबूत राय नहीं रख पाते थे। क्या खबर लीड होनी चाहिए इस पर वे कभी कोई सटीक सलाह भी नहीं दे पाते थे। उनका सारा ध्यान बंबई शहर में होनेवाले बिजनेस प्रेस कांफ्रेंसों पर रहने लगा था। वे हमेशा वहां कारपोरेटी जुगाड़बाजी से अपने लिए कोई बड़ा खेल करने की जुगत में ही लगे रहते थे। इस वजह से वे शाम के सात बजे दप्तर आने लगे थे।

47. ससून डॉक के बड़े लोगों की कहानियां

ससून डॉक गेस्ट हाउस में रहते हुए हमने वहां के लोगों से कई तरह की कहानियां सुनी। इन कहानियों में कितनी सच्चाई है या फिर इनमें कितना झूठ मिला हुआ है यह तो मैं नहीं कह सकता। मैं इन कहानियों के सच होने का बिल्कुल दावा नहीं करता। मेरा किसी से कोई दुराग्रह नहीं। अपने लिए तो सभी आदरणीय ही हैं। जिनने मेरा भला किया वे भी आदरणीय हैं और जिनने मेरा बुरा किया वे भी आदरणीय हैं। सारा किया धरा यहीं रह जाता है। अब तो मेरा मानना है कि मेरे साथ जिसने जो किया सब अच्छा ही किया। मेरे अच्छे के लिए ही किया। मेरे प्रारब्ध में यही सब था। मेरे साथ जो कुछ भी हुआ इसीलिए हुआ। इसलिए मैं तो सिर्फ वहां के जिम्मेदार लोगों और रहवासियों के मुंह से सुनी गई उन बातों को यहां जस का तस रखने का प्रयास भर कर रहा हूं। अब इन कहानियों को सुनानेवाले लोगों ने अगर मुझसे और मेरे साथियों से जानबूझकर झूठ बोला हो तो वह उनका धर्म जाने।

ससून डॉक गेस्ट हाउस में कई बड़े लोग रहते थे। इंडियन एक्सप्रेस की बंबई यूनिट के मैनेजर संतोष गोयनका जी और उनके माता-पिता भी वहीं रहते थे। उन दिनों संतोष गोयनका जी की शादी नहीं हुई थी। उनके बडे भाई सुशील गोयनका जो चंडीगढ़ यूनिट में मेरे समय में मैनेजर थे और फिर वहां से निकलने पर वे नेपाल में अपना कोई काम-धंधा करने लगे थे। कभी-कभार जब वे बंबई अपने माता-पिता के पास आते थे तो वहीं ससून डॉक में आते-जाते मेरी उनसे मुलाकातें हो जाती थीं। मैं उनको नमस्कार करता था और तब चंडीगढ़ में उनके साथ काम करने की यादें ताजा हो जाती थी। संतोष गोयनका जी के पिताजी बैजनाध गोयनका जी से भी वहां हमारी मुलाकातें होती रहती थी और वे हमें पहचानने लगे थे। वे बड़े ही सहज, ईमानदार, निर्विकार, छल-कपट से दूर और मृदुभाषी व्यक्ति जान पड़ते थे। पर उनकी अपनी कुछ पारिवारिक परेशानियां थी जिससे वे बहुत व्यथित, चिंतित और परेशान रहा करते थे। इन्हीं कारणों से वे अक्सर दूसरी मंजिल के अपने फ्लैट से नीचे उतरकर ग्राउंड फ्लोर पर स्थित गार्ड रुम में आकर गार्ड के पास बैठ जाते थे औऱ कई-कई घंटों तक वहीं बैठे रहते थे। कई बार वे बहुत भूखे भी होते थे और तब कंपनी की गेस्ट हाउस का गार्ड उनको अपने पैसे से छोले-कुलचे, चना-चबेना या पावरोटी जैसी चीजें मंगाकर खाने को दे दिया करते थे। हम आते-जाते कई बार उनको ऐसी चीजें खाते देखा करते थे।

बैजनाथजी हमलोगों से भी बड़े प्यार से बातें करते थे। वे हमें बेटा कहकर बुलाते थे। बैजनाथजी की परेशानियां उनके चेहरे पर साफ-साफ झलकती थीं। इस बुढ़ापे में निरंतर उनकी यह दयनीय दशा देखकर हम भी बहुत चिंतित हो जाते थे। हमने एक बार गार्ड से ही पूछ लिया कि बैजनाथजी की परेशानी क्या है। हमें गार्ड साहब ने ही बताया था कि बैजनाथजी के साथ क्या परेशानियां चल रही हैं और वे अक्सर वहां गेट पर क्यों बैठे रहते हैं और गार्ड का दिया क्यों खाया करते हैं। बकौल गार्ड साहब बैजनाथजी के बेटे संतोष गोयनका अपने पिता को बहुत प्रताड़ित करते थे। अक्सर उनको खाना नहीं देते थे और मारते-पीटते भी थे। गार्ड साहब ने हमें बताया कि बैजनाथजी को घर में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं और वे यह सब गेट पर आकर बैठते हैं तो हमें (गार्ड को) बताते हैं। एक बार तो हमने भी उनको घायल अवस्था में वहीं गार्ड रुम में बैठा देखा था। उन्होंने हमें अपने जख्म दिखाए थे। उनके हाथों, पैरों और पीठ वगैरह में कई जगह चोटें आई थी। चोट से खून भी निकला था। उनके वृद्ध शरीर पर कई जगह चोट के निशान थे मानो उन्हें किसी चीज से मारा गया हो। हमने जाना कि गार्ड ने ही उनके उन जख्मों पर डेटॉल लगा दिया था और बाजार से दर्द की कुछ गोलियां भी मंगाकर उनको दी थी।

संतोष गोयनकाजी के पिता बैजनाथजी हमें कई बार आते-जाते गेट पर रोक लेते थे और हमें अपनी पारिवारिक परेशानियां बताने लग जाते थे। कई बार हमें रोककर वे ऐसी बातें बता जाते थे जो निहायत निजी और काफी शर्मनाक होती थी और उन्हें यहां लिखने में भी मुझे बहुत संकोच हो रहा है। मैं वह सब यहां न चाहते हुए भी लिख रहा हूं। ऐसा करके मैं सिर्फ एक ईमानदार संस्मरण लिखने का अपना धर्म निभा रहा हूं। जस की तस धर दीन्ही चदरिया। एक दिन उन्होंने हमें वहीं गेट पर रोक लिया और कहने लगे, “तुम्हारे संपादक राहुल देव की पत्नी ने मेरे लड़के संतोष को बिगाड़ दिया है। जब तुम्हारा राहुल देव दफ्तर चला जाता है तब मेरा बेटा संतोष राहुल के फ्लैट की रसोई की खिड़की से उसके कमरे के अंदर दाखिल होता है। मैंने उसे किचन की खिड़की से बाहर निकलते खुद देखा है और रंगे हाथ पकड़ा है।“ अंकल बैजनाथजी की यह बात सुनकर हम पानी-पानी हो गए। हमने हाथ जोड़कर उनसे विनती की कि हमें कृपया यह सब न सुनाएं। राहुलजी और संतोषजी दोनों हमारे लिए बहुत ही आदरणीय हैं। इसपर अंकल बैजनाथजी बोले, “मैं तुमलोगों को यह इसलिए बता रहा हूं ताकि तुमलोग यह जान लो कि तुम्हारे संपादक राहुल देव का चरित्र कैसा है।“  इसके कुछ दिनों बाद अंकल बैजनाथजी ने फिर एक दिन हमें गेट पर रोक लिया और बोले, “मैं तो दिल्ली जाकर तुम्हारे प्रधान संपादक प्रभाष जोशी से मिलकर आया। मैं उनको यह कहकर आया हूं कि आप राहुल देव को नौकरी से निकाल दीजिए या फिर उसकी पत्नी को आप रख लीजिए। राहुल देव की पत्नी ने मेरे बेटे को बिगाड़ दिया है।“  अंकलजी की यह बात सुनकर हम फिर पानी-पानी हो गए। अंकल बैजनाथजी की इन बातों पर हमें जरा भी यकीन नहीं हो रहा था। यकीन करने लायक यह बात ही नहीं थी। हम सभी यही सोचते रहे कि ऐसा घिनौना काम तो कभी सच हो ही नहीं सकता। यह सब पूरी तरह झूठ ही है। हमारी अंतरात्मा अंकल बैजनाथजी की कही बातों को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। फिर हमने यह भी सोचा कि अंकल बैजनाथजी इस उम्र में हमसे ऐसा घिनौना झूठ बोलने का पाप आखिर क्यों करेंगे।

अंकल बैजनाथ जी का गेट पर गार्ड रुम में बैठना पहले की ही तरह आगे भी जारी ही रहा। वे वहां गार्ड रुम में परेशानहाल बैठकर छोले-कुलचे और चना-चबेना खाते हमें मिलते ही रहे। आते-जाते उनको हम नियमित रूप से आदर-सम्मान के साथ रोज प्रणाम जरूर करते थे। इसी तरह समय गुजरता गया। कुछ समय बाद एक दिन गेट पर ही गार्ड नें हमें रोककर चुपके से बताया, “आज संतोष सर के पिताजी बैजनाथ अंकल को कुलाबा थाने की पुलिस यहां से पकड़कर थाने ले गई है और वे वहीं थाने के लॉकअप में बंद हैं। वहां वे बेचारे बहुत तकलीफ में होंगे। आपलोग कुछ कर सकते हो तो करो।“ गार्ड की यह बात सुनकर हम तो सन्न रह गए।

हमलोग बैजनाथ अंकल जी के बारे में अब तक सुनी गई बातों को आपस में जोड़कर समझने का प्रयास करने लगे। इन बातों को मन में गुनने के बाद हमें जितना कुछ समझ आ रहा था वह बेहद खतरनाक, चिंताजनक और शर्मनाक दिख रहा था। हमने गार्ड साहब से कहा कि तुरंत संतोष गोयनकाजी को और हमारे स्थानीय संपादक राहुलदेवजी को फोन लगाइए और उन्हें इस घटना की फौरन सूचना दीजिए ताकि वे लोग तुरंत बैजनाथ अंकल जी की मदद कर सकें। इस पर गार्ड साहब ने जो कहा वह तो और भी चिंताजनक था। गार्ड साहब ने बताया कि “संतोष सर और राहुलदेव सर ने ही तो पुलिस को बुलवाकर अंकलजी को गिरफ्तार करवाकर अंदर करवाया है।  इसलिए वे लोग अंकलजी को छुड़वाने कभी नहीं जाएंगे।“ पता नहीं इन बातों में कितनी सच्चाई थी। इसके बाद हम दफ्तर चले गए और खबरों के अपने काम में जुट गए। फिर अगले दिन पता चला कि कंपनी के छोटे मालिक विवेक खेतान साहब खुद कोलाबा पुलिस थाने गए थे और वहां जमानत देकर बैजनाथ अंकल को वहां से छुड़ा कर घर लाए थे। हमने कोलाबा पुलिस थाने जाकर इस मामले के बारे में आगे कुछ भी पता लगाना मुनासिब नहीं समझा कि बैजनाथ अंकल को पुलिस ने किसकी शिकायत पर और किन-किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था और थाने ले गई थी। यह मामला बड़े घरों का था और यह हमारी कंपनी के मालिकों, मैनेजर और हमारे आदरणीय संपादक से जुड़ा हुआ था और इस मामले में जरा भी हाथ डालना अपनी नौकरी को जानबूझ कर गंवाने का ही कदम होता। सो इस बारे में हम बिल्कुल चुप ही रहे। हम तो सिर्फ यही सोच रहे थे कि बैजनाथ अंकल जो इस बुढ़ापे में ठीक से चल भी नहीं सकते थे वे ऐसी क्या गलती या ऐसा कौन सा गंभीर अपराध कर सकते हैं जो उनको पुलिस आकर घर से पकड़ ले जाए और पुलिस को उन्हें थाने के लॉकअप में बंद करना पड़े। इस सबसे यही समझ में आ रहा था कि दफ्तर में  शायद ठीक ही सुना था कि राहुलजी अंदर से बड़े काले आदमी हैं। 

वयोवृद्ध बैजनाथ अंकल की इस गिरफ्तारी और कोलाबा थाने के लॉकअप में उनको बंद करने की इस घटना की खबर ने हमें झकझोर कर रख दिया। हम कई दिनों तक इसके सदमें में रहे। कई हफ्तों तक हमारे मन में इस घटना को लेकर तरह-तरह के सवाल और फिर उनके जवाब उभरते और कौंधते रहे। सवाल यह कि  अंकल जी वयोवृद्ध हैं और देश के एक बड़े अखबार समूह के मैनेजर के पिता हैं, उनको गिरफ्तार करने से पहले पुलिस भी सौ बार सोचेगी। अंकल जी इस उम्र में ऐसा कौन सा गंभीर अपराध कर सकते हैं जो पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करने आना पड़े। मीडिया से जुड़े लोगों पर तो जल्दी पुलिस हाथ नहीं डालती। फिर अंकलजी की गिरफ्तारी किस अपराध के लिए और किसके कहने पर या किसकी शिकायत पर हुई होगी

अंकलजी इस उम्र में किसी से मारपीट तो कर नहीं सकते। मान लो उन्होंने गुस्से में किसी को कोई अपशब्द भी कह दिया हो तो भी उस आरोप में उनकी गिरफ्तारी तो बनती नहीं। जाहिर है इस उम्र में उन्होंने किसी बैंक से या किसी व्यक्ति से मोटी रकम का कोई कर्ज भी नहीं ले रखा होगा जिसे न चुका पाने पर उनकी गिरफ्तारी हुई हो। घर-परिवार के लिए कोई कर्ज भी लिया हो तो उनका बेटा बड़ी कंपनी में बहुत बड़े पद पर है और मोटी तनख्वाह पानेवाला है। कर्जा आसानी से चुक जाएगा और गिरफ्तारी की नौबत ही नहीं आएगी। फिर भी अगर वे किसी कारण से गिरफ्तार हो भी गए तो उन्हें छुड़ाने उनका मैनेजर बेटा थाने क्यों नहीं गया और कंपनी के छोटे मालिक विवेक खेतान जी को जमानत देने औऱ उन्हें छुड़ाने थाने क्यों जाना पड़ा? कंपनी के मैनेजर के वयोवृद्ध पिता की गिरफ्तारी की खबर सुनते ही अखबार के संपादक को भी दौड़कर थाने पहुंचना चाहिए था क्योंकि यह तो एक शिष्टाचार है और उससे भी बड़ा एक प्रोटोकॉल भी तो है। पर सूचना के मुताबिक उन्हें छुड़ाने न तो उनका मैनेजर बेटा थाने जाता है और न कंपनी का संपादक। है न हैरान करनेवाली बात?  ऐसे में कंपनी के छोटे मालिक विवेक खेतान को अंकलजी से अपनी दूर की रिश्तेदारी ही सही, उस रिश्तेदारी और गोयनका परिवार की प्रतिष्ठा को खंडित होने से बचाने की खातिर रात को थाने जाकर अंकल जी की जमानत देनी पड़ी और उनको वहां से छुड़ाकर घर लाना पड़ा। ऐसे में वही एक गाना गुनगुनाने को मन किया- आंधी जब नाव डुबोए तो उसे मांझी पार लगाए और मांझी ही जब नाव डुबोए तो कौन बचाए? पर विवेक खेतान साहब अंकलजी के पुत्र न होते हुए भी उनके पुत्र बनकर उन्हें छुड़ाने थाने में हाजिर हो गए। वहां की तरह-तरह की कहानियां सुन-सुनकर और उन तात्कालिक परिस्थितियों के मद्देनजर हमने अनुमान लगाया कि वयोवृद्ध बैजनाथ अंकल की अचानक हुई यह गिरफ्तारी एक इमरजेंसी तो थी ही। इस गिरफ्तारी की सूचना देनेवाले ने सबसे पहले तो उनके मैनेजर बेटे संतोष गोयनका जी को ही खबर दी होगी। फिर उसी ससून डॉक गेस्ट हाउस में उनके पड़ोस में रहनेवाले अखबार के संपादक राहुल देव जी को बताया होगा। पर जब इन दोनों ने कोई अनुकूल रिस्पांड नहीं किया होगा तब जाकर सुप्रीम अथॉरिटी यानी कंपनी के छोटे मालिक विवेक खेतान साहब को खटखटाया गया होगा। पर हो सकता है हम अल्पज्ञानियों का यह अनुमान भी गलत हो। वहां रहने के कारण हमें तो बस बैजनाथ अंकल जी से सहानुभूति रहती थी इसीलिए हम ऐसा कुछ सोच रहे थे और इस तरह का अनुमान लगा रहे थे।

– गणेश प्रसाद झा

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गुरुवार, 12 मई 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 18

 एक पत्रकार की अखबार यात्रा की अठारहवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 18

40. कोलाबा में कुकर्मों का कोडवर्ड

कोलाबा जहां इंडियन एक्सप्रेस का गेस्ट हाउस था और जहां हम रहते थे वह इलाका नाइट लाइफ के लिए काफी मशहूर है। कोलाबा की हर गली और हर लॉबी में कुछ न कुछ आपत्तिजनक होता रहता है। इसे ऐसे कहें कि यहां क्या कुछ नहीं होता। बंबईवालों के लिए तो यह सब बिल्कुल सामान्य सी बात है। ये सारे धतकरम उनकी काली कमाई का जरिया हैं। पर हम बाहर से वहां गए पत्रकारों के लिए वह सब बिल्कुल गलत गतिविधियां थीं। हमने कुछ ही हफ्तों में पूरे कोलाबा को सूंघ डाला और सारे धतकर्मों का पता लगा लिया। कोलाबा के जिस कैलाश पर्वत रेस्टोरेंट में हम खाना खाते थे वहां कभी लता मंगेशकर ने भी भोजन किया था। रेस्टोरेंट के काउंटर पर लताजी की खाना खाते ङुए पल की तस्वीर लगी है। पर हम जब वहां से खाना खाकर निकलते थे तो रेस्टोरेंट की चौकठ से बाहर पांव रखते ही एक लड़की खड़ी मिलती थी जो धीरे से पूछती थी, “बैठना है क्या?” हम कुछ समझ नहीं पाते थे और आगे बढ़ जाते थे। जब यह सिलसिला बार-बार चलता दिखा तो हमने उस इलाके में बरसों से पान बेचने का काम कर रहे उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक सज्जन से एक दिन पूछा कि बैठना है क्या का मतलब क्या है और रेस्टोरेंट के बाहर खड़ी रहनेवाली एक लड़की हमसे ऐसा क्यों पूछती है। पानवाले भैया पहले तो ठहाके मारकर हंसे पर फिर चुपचाप बताया कि वे लड़कियां दरअसल कॉल गर्ल होती हैं और इस तरह ऐसा बोलकर वे अपने लिए ग्राहक तलाश करती हैं। यह उनका कोडवर्ड है।

कोलाबा में एक रेस्टोरेंट है वाक-इन जो व्यभिचार और अनैतिक गतिविधियों के लिए कुख्यात बताई गई। वहां कैबरे डांस होता था। रेस्टोरेंट के गेट पर कई मुस्टंडे खड़े रहते थे जो उनके बाउंसर होते थे। शाम ढलने के बाद वहां उस तरह के लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी। महंगी-महंगी गाड़ियों में लोग वहां आनंद लेने आते देखे जाते थे। हम उस होकर आते-जाते अक्सर वॉक-इन के गेट पर मारपीट होते देखा करते थे जब उसके बाउंसर लोगों को बुरी तरह पटक कर पीटते थे। पर वहां पुलिस कभी नहीं आती थी जबकि थाना बिल्कुल पास में ही था। इस मामले में वहां के कुछ लोग कोलाबा की तुलना नाइटलाइफ के लिए कुख्यात अमेरिका के शहर लॉस वेगास से भी करते हैं।

कोलाबा में पत्र-पत्रिकाएं बेचने का एक स्टाल है जहां मैं अक्सर जाया करता था और अपनी पसंदीदा न्यूज मैगजीन टाइम और न्यूजवीक पत्रिकाएं खरीदा करता था। इस स्टॉल पर ये महंगी पत्रिकाएं हप्ते-दस दिन बाद काफी कम कीमत पर मिल जाया करती थीं। हमें पता चला था कि इस स्टॉल पर ब्लू फिल्मों के वीएचएस कैसेट भी छिपे रुस्तम उपलब्ध कराए जाते हैं। इस स्टॉल पर कई बार अंग्रेजी की पत्रिकाएं पढ़ती इंगलिश-स्पीकिंग लड़कियां भी खड़ी मिलती थी जो असल में कुलीन घरों की लड़कियां होती थी जो कॉलगर्ल का काम करती थीं। शाम ढलते ही कोलाबा के कुछ खास स्टोर्स के आसपास, रीगल सिनेमा के इर्द-गिर्द और सड़क के किनारे-किनारे अच्छे घरों की धंधा करनेवाली लड़कियां कस्टमर की तलाश में घूमती दिखाई देने लगती थीं। खुलापन भी ऐसा कि आप सौदा करके वहीं राह चलते उन्हें आलिंगन भी कर ले सकते हैं। सरेआम चूमना भी चाहें तो भी उनहें कोई परेशानी नहीं। हमने ऐसे नजारे वहां खूब देखे।

कोलाबा के मुहाने पर एक गोलंबर है जिसे कोलाबा सर्कल कहते हैं। वहीं है सुप्रसिद्ध जहांगीर आर्ट गैलरी। शाम को वहां कला के पारखी लोगों और दूसरे सामान्य लोगों की अच्छी खासी संख्या रहती है जो इसके अंदर रखी कलाकृतियों को देखने आते हैं। पर इसी आर्ट गैलरी के कंपाउंड में आपको ये कालगर्ल्स भी खड़ी या टहलती दिख जाएंगी जो वहां अपने लिए ग्राहकों को पटाने की फिराक में रहती हैं।

अब कोलाबा से थोड़ा आगे चलते हैं, फोर्ट रोड या फोर्ट मार्केट की तरफ। कोलाबा से जब आप वीटी की तरफ जाते हैं तो सड़क के दाहिनी तरफ पुरानी इमारतों के किनारे-किनारे की पटरी पर बाजार लगता है। वहां उन दिनों ज्यादातर स्मगल्ड गुड्स बिका करती थी। खरीदारों की भीड़ भी रहती थी। उसी भीड़ में जगह-जगह ये बदनाम लड़कियां खड़ी मिल जाती थीं। वहीं खड़-खड़े अपना कस्टमर तलाश लेने और फिर उन्हें पटा लेने में माहिर ये लड़कियां ग्राहक मिलते ही टैक्सी बुलाकर फुर्र हो जाती थीं। बिल्कुल निडर और बिंदास होती हैं ये धंधेबाज बालाएं। बंबई के वीटी रेलवे स्टेशन पर तो सैकड़ों की तादाद में धंधा करनेवाली लड़कियां हर शाम खड़ी  मिल जाती थीं। कुछ तो दोपहर को भी मिल जाती थीं। वहां वे देर रात तक उपलब्ध रहती थीं। शाम को गेटवे ऑफ इंडिया पर समंदर किनारे के खुशनुमा माहौल में भी कॉलगर्ल्स टहलती मिल जाती थी। और उनको ग्राहक मिलने का इंतजार कर रहे होते थे कुछ पुरबिया टैक्सीवाले भैया। टैक्सी में बैठते ही उनकी हरकतें चालू हो जाती थी और उनकी इन हरकतों को देखकर समझ में आ जाता था कि वे पति-पत्नी तो बिल्कुल नहीं हैं।

41. गगनचुंबी इमारत से निकलते अखबार

दक्षिण बंबई में कोलाबा के ससून डॉक गेस्ट हाउस से करीब 4 किलोमीटर दूर अरेबियन सी के किनारे मरीन ड्राइव के मुहाने पर स्थित नरीमन पॉइंट पर इंडियन एक्सप्रेस की 25-मंजिली इमारत है- एक्सप्रेस टॉवर्स। इस इमारत को एक्सप्रेस समूह के जन्मदाता रामनाथ गोयनका जी ने बनवाया था। अखबारों का यह एकदम अनूठा दफ्तर था। शायद ही देश में ऐसी किसी गगनचुंबी इमारत से अखबार निकलते होंगे। इस इमारत में दूसरी मंजिल पर एक बड़े से हॉल में एक्सप्रेस समूह के सभी पांच अखबारों इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस, लोकसत्ता, समकालीन और जनसत्ता का एडिटोरियल और रिपोर्टिंग विभाग था। सभी संपादकों के चैंबर भी वहीं थे। पूरा हॉल पत्रकारों से खचाखच रहता था। वहीं एक बड़े कक्ष में टेलिप्रिंटर सेक्सन था जिसमें इंडियन एक्सप्रेस के न्यूज नेटवर्क और तमाम समाचार एजेंसियों के टेलिप्रिंटर लगे थे। प्रिंटिंग विभाग नीचे बेसमेंट में था। कोई साल भर बाद रेनोवेशन की वजह से सारे अखबारों के एडिटोरियल तीसरे माले पर ले जाए गए। तीसरे माले के हमारे एडिटोरियल हाल से समंदर और ओबेरॉय होटल का स्वीमिंग पूल बिल्कुल सामने और साफ-साफ दिखता था। वहां का नजारा बड़ा ही मनमोहक होता था जब सुंदरियां स्वीमिंग वाले कपड़ों में पूल में छलांग लगाया करती थीं। इस बारे में वहां साथियों की राय होती थी कि इससे काम की थकान मिट जाती थी।

42. शुरू करते ही संपादक से पंगा

बंबई जनसत्ता में काम शुरू किए चंद रोज ही हुए थे कि मुझे एक बड़ी खबर हाथ लग गई। उस समय शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। किन्हीं राजनैतिक कारणों से उन्होंने एक अजीब सा निर्णय ले लिया। विधानसभा में बाकायदा एक प्रस्ताव पास करा लिया गया कि राज्य के तमाम राष्ट्रीयकृत बैंकों में राज्य सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और निगमों आदि के जितने भी खाते चल रहे हैं उन सबसे सारे के सारे पैसे निकालकर महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक की शाखाओं में जमा करा दिए जाएं। बड़ा अजीब निर्णय था और इसका बड़ा ही दूरगामी असर होने वाला था। मैंने इस खबर को दिल्ली जनसत्ता को भेजने का निर्णय़ लिया। मैं वहां कोई रिपोर्टर नहीं था। मैं तो डेस्क का आदमी था और डेस्क पर ही रखा गया था। पर मैंने अपने तई यह निर्णय लिया कि यह खबर राष्ट्रीय संस्करण के लायक है इसलिए इस दिल्ली भेज दी जानी चाहिए। हालांकि यह जिम्मेदारी तो वहां के स्थानीय संपादक राहुलदेवजी की थी। यह तय करना भी उनका ही काम था कि महाराष्ट्र में आज कौन-कौन सी खबर है और उसमें से कौन-कौन सी खबर राष्ट्रीय कलेवर वाली है और दिल्ली संस्करण के लायक है। पर तब तक वहां रहते हुए उनमें मैंने कभी ऐसी कोई रुचि नहीं देखी थी। जनसत्ता का बंबई संस्करण इस खबर को काफी अंडरप्ले करते हुए एक साधारण खबर के रूप में बिल्कुल साथारण डिस्प्ले देकर छाप रहा था। मैंने बिना किसी से कुछ पूछे उस खबर को नए अंदाज में रोमन में चार कॉलम साइज में लिखा और इंडियन एक्सप्रेस के टेलीप्रिंटर नेटवर्क से दिल्ली भेज दी। थोड़ी ही देर में वह खबर कंपोज होकर दिल्ली संस्करण के डाक संस्करणों में तो छपी ही, बंबई भी आ गई। दिल्ली के डाक संस्करणों में वह खबर पहले पेज का बॉटमस्प्रेड थी। बंबई में पहले पेज पर सिंगल कॉलम में छापी गई। दिल्ली से जैसे ही वह खबर आई किसी ने उसकी ब्रोमाइड दूसरी खबरों के साथ राहुलजी की मेज पर रख दी। दिल्ली डेस्क ने उस खबर में मेरी बाईलाइन लगा दी थी। खबर देखते ही राहुलजी ने मुझे अपनी केबिन में बुलाया और बरस पड़े। राहुलजी ने कहा, “आपने यह खबर दिल्ली कैसे और क्यों भेज दी। मैं तो इसपर एडिट लिखनेवाला था।“  मैंने उनसे कहा कि यह खबर तो यहां सिंगल कॉलम में छप रही है। यह एक बड़ी नेशनल खबर है इसलिए मैने इसे दिल्ली भेज दी। मुजे डांट-डपट कर गलत ठहराकर राहुलजी शांत हो गए। फिर मेरी लिखी वह खबर उन्होंने वहां भी छापने को कह दिया। खबर छप गई और बाईलाईन ही छपी। पर इस घटना से मैं राहुलजी की नजरों में चढ़ जरूर गया। मेरे प्रति इस चिढ़ को उन्होंने आखिर तक यानी जब तक वे एक्सप्रेस समूह में रहे तब तक याद रखा और मुझे समय-समय पर कुछ न कुछ नुकसान पहुंचाते ही रहे। इसी को कहते हैं किसी बात की गांठ बांध लेना। यहां यह साफ कर देना गलत नहीं होगा कि जब तक मैं बंबई जनसत्ता में रहा राहुल जी ने मेरी जानकारी में एक बार भी एडिट (संपादकीय) नहीं लिखा। एडिट लिखना तो दूर, उन्होंने तो कभी कोई लेख भी नहीं लिखा।  जनसत्ता बंबई का संपादकीय पेज तो हमेशा दिल्ली वाला ही जस का तस जाया करता था। मेरे दिल्ली आ जाने के बाद अगर राहुलजी ने कभी एडिट या एडिट पेज पर कोई लेख लिखा हो तो वह मुझे नहीं मालूम। पर शायद नहीं ही लिखा है।

– गणेश प्रसाद झा

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पत्रकारिता की कंटीली डगर- 19


एक पत्रकार की अखबार यात्रा की उन्नीसवीं किश्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 19


43. स्थानीय संपादक का कॉमर्स प्रेम

राहुल देव जी की कॉमर्स की खबरों और कॉमर्स पेज में एकाएक बहुत दिलचस्पी हो गई थी। बंबई जनसत्ता में कॉमर्स पेज कश्यप गजब भाई देखते थे। वे बंबई के ही गुजराती भाषी थे। उनकी टीम में थीं सुनंदा शर्मा, भारती पावस्कर तृप्ति जानी और आलोक गुप्ता। अखबार का कॉमर्स पेज बड़ा मालदार और फायदे का होता है। जो पत्रकार कॉमर्स पेज पर होता है उसे बिजनेस कंपनियों के प्रेस कांफ्रेंस में अच्छी-अच्छी गिफ्ट भी मिलती रहती है। ऐसे बिजनेस प्रेस कांफ्रेंस आए दिन होते रहते हैं। बंबई तो देश की आर्थिक राजधानी है, वहां तो ऐसे बिजनेस प्रेस कांफ्रेंस हर दिन और एक ही दिन में कई-कई प्रेस कांफ्रेंस होते रहते हैं। जाहिर है कॉमर्स पेज के इंचार्ज कश्यप गजब भाई लगभग रोज ही ऐसे प्रेस कांफ्रेस अटेंड करते थे। जाहिर है उन्हें गिफ्ट भी मिलती ही होगी। और बंबई में गिफ्ट भी कोई ऐसी-वैसी नहीं मिलती, थोड़ी कायदे की ही मिलती है। पर यह सब तो गजब भाई की नौकरी का हिस्सा था इसलिए इसमें गलत कुछ भी नहीं था। बिजनेस प्रेस कांफ्रेंस कवर करने जाना तो कॉमर्स डेस्क इंचार्ज की जिम्मेदारी थी। राहुल जी ने गजब भाई पर यह दबाव डालना शुरू किया कि वे उनको भी बिजनेस प्रेस कांफ्रेंसों में साथ सेकर चलें और कंपनी मालिकों और कंपनियों के बड़े-बड़े अधिकारियों से उनका परिचय कराएं। यह बड़ी अजीब बात थी और निहायत छोटी बात भी थी कि किसी अखबार का स्थानीय संपादक अपने मातहत के किसी पेज इंचार्ज से ऐसी बात बोले। इस बात का खुलासा हमसे खुद गजब भाई ने ही किया। गजब भाई ने बताया कि शुरू में तो वे इस बात को इग्नोर कर गए पर तब राहुलजी ने उनपर दबाव बढ़ा दिया और उनसे कड़ाई से पेश आने लगे। उनके कॉमर्स पेज के प्रस्तुतिकरण को राहुलजी खराब बताने लग गए और कहने लगे कि उनका काम संतोषजनक नहीं हो रहा। बार-बार इस तरह की नकारात्मक टिप्पणियों से गजब भाई को अपनी नौकरी ही परेशानी में पड़ती दिखाई देने लगी। पर उन्हें अंदर की बात समझते देर न लगी और वे तब राहुलजी को अपने साथ बिजनेस प्रेस कांफ्रेंसों में ले जाने लगे। वे बिजनेस टायकूनों से उनका परिचय भी कराने लगे। फिर जो भी गिफ्ट मिलती वह गजब भाई के साथ-साथ राहुलजी को भी मिलने लगी। इस तरह राहुलजी के पास भी गिफ्ट आइटम इकट्ठा होने लगे। जल्दी ही उनके घर में गिफ्टों का अंबार लग गया। उन्हीं दिनों एक बार भाभी जी ने हमें सोने की एक छोटी सी हथौड़ी दिखाई थी। उन्होंने ही बताया था कि यह सोने की है और प्रेस कांफ्रेंस में गिफ्ट में मिली है। इसके बाद तो राहुलजी छोटे-छोटे और अदना किस्म के बिजनेस प्रेस कांफ्रेंसों तक में भी नजर आने लगे थे। यह एक्सप्रेस ग्रुप जैसे बड़े अखबार समूह के एक स्थानीय संपादक के लिए बड़े ही शर्म की बात थी। पर राहुलजी को तो गिफ्ट बटोरना होता था। बंबई के मीडिया जगत और बिजनेस वर्ल्ड में राहुलजी की इस घटियागीरी की खूब किरकिरी होती सुनाई देती थी। कुछ लोग कहते थे कि शायद इसके जरिए वे किसी बड़ी कंपनी में कोई बड़ा ओहदा जुगाड़ने या फिर कोई और बड़ा खेल करने की जुगत में भी थे।

जल्दी ही राहुलजी के इंडियन एक्सप्रेस समूह की बंबई यूनिट के मैनेजर संतोष गोयनका जी (मालिक रामनाथ गोयनका के गांव के निवासी और उनके दूर के रिश्तेदार) से बड़े प्रगाढ़ संबंध कायम हो गए। उनके जरिए इंडियन एक्सप्रेस समूह के कंपनी मालिक विवेक खेतान (मालिक रामनाथ गोयनका के नाती जो बाद में  रामनाथ गोयनकाजी के वारिस बनकर विवेक गोयनका बन गए) तक उनकी जबरदस्त पहुंच कायम हो गई। दरअसल, राहुलजी ने मैनेजर संतोष गोयनका का सहारा लेकर विवेक खेतान के घर में सेंध लगाई। राहुलजी अखबार के स्थानीय संपादक थे तो वैसे भी मालिकों-मैनेजरों ले उनका संबंध तो होना ही था। पर मैं यहां जिस तरह के संबंधों की बात कर रहा हूं वह बहुत-बहुत गहरा, अंतरंग और बिल्कुल खास तरह का था। राहुलजी ने कुछ ऐसा जाल बुना कि इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के मालिक विवेक खेतान के घर उनकी सपरिवार इंट्री होनी शुरू हो गई और वे बार-बार सपरिवार वहां जाने लगे। इस एकतरफा घनिष्टता को राहुलजी ने खूब आगे बढ़ाया और अपने फायदे के लिए उसे जमकर भुनाया भी। राहुलजी ही सपरिवार विवेक खेतान जी के घर जाया करते थे। विवेक खेतान जी शायद कभी राहुलजी के घर नहीं आए थे।

अखबार की बंबई यूनिट के मैनेजर संतोष गोयनका जी तो ससून डॉक में ही अपने मात-पिता के साथ रहते थे। हमारे ही प्लोर पर कंपनी ने उन्हें एक बड़ा फ्लैट दिया हुआ था। कुछ महीने हमारे साथ रहने के बाद जल्दी ही राहुलजी ने ससून डॉक गेस्ट हाउस में अपने लिए एक अलग फ्लैट का जुगाड़ कर लिया और उसी फ्लोर पर हमारे फ्लैट से नए फ्लैट में शिफ्ट हो गए। वह फ्लैट कंपनी के बड़े मालिक रामनाथ गोयनका जी ने अपने किसी परिचित को दिया हुआ था जो अब शहर में कहीं और या शायद कहीं विदेश में रहने चले गए थे और फ्लैट खाली हो गया था।

44. हमें फ्लैट से निकालने की चाल

ससून डॉक गेस्ट हाउस में हमलोग जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जी के आदेश से रहते थे। प्रभाष जी ने बंबई संस्करण शुरू होने के समय कंपनी के मालिक रामनाथ गोयनका और उनके नाती (छोटे मालिक) विवेक खेतान से इस बात की इजाजत ले ली थी कि बाहर से जिसे भी वो लाएंगे उनको रहने की जगह कंपनी को देनी होगी। इसी नाते हमें वहां जगह मिली हुई थी। उस समय प्रभाषजी की वो हैसियत थी कि वे जो कुछ भी कह देते थे उसे विवेक गोयनका जी स्वीकार कर लेते थे। इसकी वजह थी कि प्रभाषजी रामनाथ गोयनका जी के राजनैतिक संघर्ष के दिनों के साथी थे। राहुल जी के अलग फ्लैट में शिफ्ट होने के एकाध महीने बाद ही हमें उस फ्लैट से निकालकर उसी बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर बने गोदाम के एक हिस्से में रहने के लिए भेज दिया गया। वहां पानी और शौचालय वगैरह का बड़ा ही टूटा-फूटा इंतजाम था। वहां काफी सारा कबाड़ भरा पड़ा था। उसी कबाड़ में हमें वहां एक बिल्कुल टूटी फोल्डिंग चारपाई, एक लकड़ी का टूटा हुआ तख्त और एक बेकार हो गई एक फुट चौड़ी एक बेंच पड़ी मिली। हम तीन लोगों ने उन्हें जोड़कर किसी तरह से अपने सोने के लिए तैयार किया। टूटी चारपाई पर रविराज प्रणामी, टूटे तख्त पर सदानंद गोड़बोले और बेंच पर मैं सोने लगा। पीने का पानी हमें वहां के गंदे और टूटे संडास और टूटे हुए बाथरुम की टोंटी से ही लेना पड़ता था। हमलोग वहीं नहाते-धोते थे। उस गोदाम में जाते ही हमारा जीवन बिल्कुल नर्क बन गया।

गोदाम की खिड़कियां बुरी तरह टूटी हुई थी। और उस होकर बाहर से कौए मछलियों के अपशिष्ट चोंच में लिए अंदर घुस आते थे और जहां-तहां गिरा जाते थे। हम तीनों शुद्ध शाकाहारी थे और हमारे लिए यह सब झेलना बड़ा कठिन होता था। पर कोई और व्यवस्था नहीं की जा सकती थी इसलिए हम तीनों वहीं पड़े रहे। शहर में हम कमरा ले नहीं सकते थे क्योंकि हमारी तनख्वाह उस मुताबिक नहीं थी। उस समय भी बंबई में किराए के एक कमरे या वन तुम सेट वाले मकान के लिए हजारों रुपए की काफी मोटी पगड़ी देनी पड़ती थी। सतीश पेडणेकर उन दिनों अकेले थे और चीफ सब होने की वजह से उनकी तनख्वाह थोड़ी ठीकठाक थी इसलिए वे बाहर कमरा लेने में सक्षम थे। उन्होंने मालाड में किराए पर एक कमरा ले लिया था और वहीं चले गए थे। इंद्र कुमार जैन ने ठाणे में कमरा ले लिया था और वे भी गेस्ट हाउस से वहां शिफ्ट हो गए थे। इंदौर के विभूति शर्मा नौकरी छोड़कर वापस नई दुनिया जा चुके थे। बच गए थे सिर्फ हम तीन।

हमें बाद में मालूम पड़ा कि हमें गेस्ट हाउस के फ्लैट ले निकालकर नीचे गंदे गोदाम में भिजवाने में स्थानीय संपादक राहुल देव जी का ही हाथ था। उन्होंने कंपनी के मैनेजर से कहकर ऐसा करवाया था। शायद राहुल देव जी को लगा होगा कि उनके मातहत काम करनेवाले छोटे लोग और अदना पत्रकार उनकी बराबरी में उनके बराबर के फ्लैट में कैसे रह सकते हैं। यह उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए उन्होंने हमसे एक दूरी बनानी चाही। सो हम नाचीजों के सामने अपनी हैसियत को और बड़ा करने के लिए ऐसा कुछ कराना उन्होंने जरूरी समझा। इसके पीछे की एक और वजह यह भी रही कि उनकी हैसियत में अचानक होने लगी उत्तरोत्तर बढ़ोतरी को हमारी नजरों से दूर कर ढांके रखने के लिए उनके लिए ऐसा करना जरूरी हो गया था।

गोदाम में रहने के दौरान हमने बहुत तकलीफें झेली। हमारे कष्टों का कोई पारावार नहीं था। हमने वहां गोदाम में रहते हुए चाय बनाने का सामान खरीदा और चाय खुद ही बनाना शुरू कर दिया। चाय हम बिजली के हीटर पर बनाते थे। दूध हम वहां अमूल का टेट्रापैक या फिर बोतल में आनेवाला दूध लाया करते थे। रविजी रात को दफ्तर से लौटते वक्त एक पार्क से शिवलिंग जैसा एक बड़ा सा सफेद पत्थर ले आए थे जिसपर हम इलायची कूटा करते थे। गोदरेज का एक बड़ा सा ताला था जिसे हम इलायची कूटने का मूसल बनाते थे। कुछ महीने बाद मैंने दिल्ली में पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिखकर रसोई गैस का एक आउट ऑफ टर्न कनेक्शन ले लिया था। उस समय कांग्रेस की सरकार में वी.शंकरानंद पेट्रोलियम मंत्री थे। राहुलजी की पत्नी ने नारियल फोड़कर मेरे गैस कनेक्सन का उद्घाटन किया था और उसपर पहली बार चाय बनाई गई थी। पर संयोग ऐसा रहा कि गैस पर हम वहां सिर्फ चाय ही बनाते रहे। खाना तो हमलोग बाहर का ही टिफिन मंगाकर खाते रहे। नौकरी करनी थी इसलिए हम तकलीफ झेलते हुए वहीं उसी हालात में रहते रहे। 

45, टिफिन का खाना और पंचम पुरी की पूरियां

हम जब गोदाम में रहने के लिए भेज दिए गए तो हमने वहां टिफिन का खाना मंगाना शुरू कर लिया। टिफिनवाला रविवार को छुट्टी कर देता था। उस दिन हम वीटी स्टेशन के पास बैलॉर्ड एस्टेट के पंचम पुरीवाला की दुकान से पूरियां लेकर आते थे। उन दिनों पांच रुपए में 6 पूरियां, आलू-मेथी की सब्जी और मिर्च का आचार मिलता था। तीस रुपए की पूरियों में हम तीनों का काम चल जाता था। आज पंचम पुरीवाले उन्हीं 6 पूरियों, आलू-मेथी की सब्जी और अचार के 65 रुपए वसूलता है। पूरियां बेचने वाली वह छोटी दुकान अब एक बड़े रेस्टोरेंट में तब्दील गई है बताते हैं जहां अब तरह-तरह की महंगी डिश परोसी जाती है।

पंचम पुरी की दुकान पर हम जब भी जाते थे तो वहां एक पागल भिखारी टहलता जरूर मिल जाता था। वह चिल्ला-चिल्लाकर गालियां देकर कहता था, साला बेईमान पंचमपुरी वाला, बेईमानी करके इतना बड़ा बन गया, साला कभी एक पुरी नहीं खिलाता। तू मरेगा साला। तेरे को कीड़े पड़ेंगे। हमने पता लगाया तो मालूम हुआ कि पंचम पुरी के मालिक और वह भिखारी दोनों एक ही जगह के हैं और दोनों बचपन में साथ ही खेले-खाए और बड़े हुए। पंचमपुरी का मालिक और उनका स्टाफ उस भिखारी की गालियां सुनते रहने का मानो आदी हो गया था। कभी-कभार वे लोग उसे कुछ पूरियां खाने को दे भी देते थे। 

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....


 


मंगलवार, 3 मई 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 17

 एक पत्रकार की अखबार यात्रा की सत्रहवीं किश्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 17

37. समंदर किनारे अखबारनवीसी

बंबई जनसत्ता में नौकरी के लिए देश की आर्थिक राजधानी की मेरी यह पहली यात्रा थी। एक विलक्षण सा शहर जहां अमीरों और गरीबों, गगनचुंबी इमारतों और टीन की छतोंवाली खोलियों तथा लाखों के फैशनेबल कपड़ों में दिखनेवाली बालाओं और घुटनों तक साड़ी समेटे रहनेवाली औरतों की भयंकर जद्दोजद का अंतहीन सिलसिला मिलता है। एक आसमान में उड़ रहा है तो दूसरा जमीन पर बिलबिला रहा है। किसी को एक दूसरे की तकलीफ पूछने का वक्त नहीं है। सभी एक ही दिशा में बस लगातार भाग रहे होते हैं। जैसे चींटियों और टिड्डियो की फौज कूच कर रही हो। ऐसा नजारा पहले कभी नहीं देखा था। समंदर यानी हिंद महासागर के हिस्से अरब सागर का भी पहली बार दीदार किया। पूरे शहर की फिजां में एक खास तरह की बदबू मिली जो समंदर और उसकी मछलियों से भभक-भभक कर आती रहती थी। इसे बंबई की खुशबू कहिए। इसे बंबईकर यानी बंबई के रहवासी बास मारना कहते हैं। सुबह- सुबह बंबई वीटी पर ट्रेन खाली हुई। वहां सें मुझे कोलाबा के ससून डॉक जाना था। स्टेशन से सीधी सड़क और कोई तीन किलोमीटर का रास्ता। पर पता नहीं था किधर है और कितनी दूर है। टैक्सी ले ली। टैक्सीवाले को बता दिया कोलाबा का ससून डॉक चलो। उसने पूछा ससून डॉक में कहां जाना है। मैंने बताया इंडियन एक्सप्रेस का गेस्ट हाउस। पर टैक्सीवाला मुझे किसी दूसरे रास्ते से काफी घुमाकर ले गया। उसे टैक्सी के मीटर को बढ़ाना जो था। वह मुझे ससून डॉक से आगे कफ परेड लेता गया। वहां पूछकर पता किया और फिर ससून डॉक वापस आया। बदमाश टैक्सीवाले ने मुझे ससून डॉक के गेट के पास मेन रोड पर ही उतार दिया। कहा अंदर मच्छी का कचरा रहता है, गाड़ी में बास मारेगा। तुम जाओ। मैं दो बड़े सूटकेस ले गया था सो गेस्ट हाउस तक ले जाने में बड़ी परेशानी हुई। गेस्ट हाउस का गार्ड दिल्ली दफ्तर से आया जानकर मुझे पहले माले पर ले गया। वहां तीन कमरे का एक प्लैट था। बाकी और भी प्लैट्स थे। वहां दिल्ली जनसत्ता के दो परिचित साथी मिले। सतीश पेडणेकर और इंद्र कुमार जैन। स्थानीय संपादक राहुल देव जी भी वहीं एक कमरे में अकेले रहते थे। बाकी दो और साथी थे। मध्य प्रदेश के बिलासपुर के सदानंद गोडबोले और इंदौर के रविराज प्रणामी। फिर कुछ द्नों बाद दो साथी और आ गए। इंदौर से ही विभूति शर्मा और हेमंत पाल। राहुलजी के कमरे में सोने के लिए एक कामचलाऊ तख्त था। बाकी एक कमरे में फर्श पर एक गद्दा बिछा था। सतीश पेडणेकर, रविराज प्रणामी और मैं एक कमरे में सोते थे। तीसरे कमरे में विभूति शर्मा और हेमंत पाल। खाना हमलोग बाहर कोलाबा के एक  नामी रेस्टोरेंट कैलाश पर्वत में खाते थे। खाना बहुत महंगा था। सस्ते खाने का वहां कोई जुगाड़ नहीं था। कोलाबा बंबई का पॉश इलाका है। हर चीज वहां हद से ज्यादा महंगी थी। एक कपड़ा प्रेस कराने के लिए 1989 में उस समय 75 पैसे देने पड़ते थे। दिल्ली में तब 50 पैसे का रेट था। कुछ महीने बाद राहुलजी अपनी पत्नी और नन्हीं सी बिटिया को लाए तो हमने उनको एक बड़ा कमरा दे दिया। फिर हमने कोलाबा के एक होटलवाले से गैस के एक सिलिंडर का जुगाड़ किया और खाना बनना शुरू हुआ। शुरू में राहुलजी की पत्नी सबका खाना बनाने लगीं। खाना बनाने में हम भी थोड़ा-थोड़ा हाथ बंटाते थे। पर हमें यह अच्छा नहीं लगा। फिर हमने खाना बनाने के लिए एक बाई रख ली। घर का खाना मिलने लगा तो थोडी राहत मिली।

38. जादुई शहर बंबई

बंबई शहर बड़ा ही खूबसूरत, मनमोहक और चकाचौंधवाला है। नाइटलाइफ के लिए तो यह शहर बड़ा ही मशहूर है और कुख्यात भी। उस समय भी था। वहां दो तरह की सिटी ट्रेनें यानी लोकल चलती हैं। एक स्लो और दूसरी फास्ट। मैं पहली बार बंबई गया था। शहर के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था। दो साल वहां रहकर भी मैं बंबई को बहुत थोड़ा ही देख और समझ पाया। रविराज प्रणामी के पास एक मोटर साइकिल थी जिसे वे इंदौर से लेकर आए थे। उनकी हीरो होंडा-एसएस-100 थी तो थोड़ी पुरानी पर दौड़ती बड़ी तेज थी। रवि की इस मोटरसाइकिल पर ही मैंने बंबई के आसपास के कुछ इलाके देखे। बंबई की पुलिस नियम-कायदों के प्रति बड़ी पाबंद होती है। रवि की मोटर साइकिल पर मध्य प्रदेश का नंबर था। पुलिसवाले जब-तब नंबर देखकर रोक लेते थे। अखबार का नाम लेने पर भी कहते थे कि सर, नंबर ट्रांसफर करा लीजिए। आप काफी दिनों से बंबई में ही चला रहे हैं। अब जल्दी बदलवा लीजिए। कई बार मैं साप्ताहिक अवकाश के दिन बेस्ट की डबल डेकर बस पर ऊपर चढ़कर बैठ जाता था और जहां तक बस जाती थी वहां तक जाता और फिर उसी से लौट आता था। इसी तरह मैंने बंबई शहर को निहारा था। रवि कई बार समंदर किनारे ले जाते थे जहां हम बीच का आनंद उठाते थे और पाव-भाजी खाते थे।

बंबई में समुद्री बीच पर यानी समंदर किनारे की रेत पर तेल मालिश का भी एक मजेदार धंधा होता है। मालिश का धंदा शाम ढलने के बाद शुरू होता है। बीच पर आपको कई–कई तेल मालिशवाले मिल जाएंगे। वे लोहे के तार से बनी एक टंगनी में तरह-तरह के तेलों की कई शीशियां लिए वहां घूमते रहते है। बड़े मनमोहक अंदाज में मालिश... मालिश... बोलते आपके बगल से गुजर जाते हैं। बस कपड़े उतार कर बीच की रेत पर लेट जाइए और करा लिजिए मालिश। मालिशवाले पूरे शरीर का दर्द खींच लेते बताते हैं। पर मैंने कभी मालिश नहीं करवाई। मालिशवाले काफी हट्ठे-कट्ठे होते हैं, बिल्कुल पहलवान टाइप। उन्हें देखकर ही मन में डर पैदा हो जाता था। पता नहीं कहीं पकड़कर रगड़ मार दी तो हड्डी का कचूमर निकल जाएगा।

पाव-भाजी का बंबई में बड़ा क्रेज है पर हम हिन्दी पट्टी वालों को यह कम ही पसंद आता था। पर मजबूरी में तो खाते ही थे क्योंकि और कुछ यानी उत्तर भारतीय जैसा कुछ महीं मिल रहा होता था। एक बार मैं, रविराज और सदानंद गोड़बोले 31 दिसंबर की रात सड़कों पर नए साल का जश्न मनाते लोगों को देखने निकले। उस रात सड़कों पर बेतहाशा भीड़ थी। सड़कों पर बहुत तेज रफ्तार था। हम पैदल ही नरीमन पॉइंट से मरीन ड्राइव तक टहलते चले गए। सोचा कुछ खाया जाए। कई अच्छे रेस्टोरेंटों में गए पर हर जगह खाने के लिए सिर्फ पाव-भाजी ही उपलब्ध था। हमने आपस में कहा कि इतना बड़ा शहर जो देश की आर्थिक राजधानी कहलाता है और खाने को मिल रहा है सिर्फ पाव-भाजी। मजबूरी में आखिरकार हम एक बड़े रेस्टोरंट में पाव-भाजी खाने बैठ ही गए। बैरे से पूछा तो उसने बताया कि आज कोई दूसरी चीज नहीं मिलेगी। तभी हमें समझ में आया कि बंबई में बड़ा-पाव कितना ज्यादा बड़ा होता है।

39. कोलाबा में समुद्री मछलियों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार

बंबई का कोलाबा बिल्कुल समंदर के किनारे स्थित है। बंबईया मराठी भाषी लोग इसे कुलाबा बोलते हैं। यहां एक प्रसिद्ध डॉकयार्ड है जिसका नाम है ससून डॉक। इस डॉकयार्ड से दिनरात समुद्री मछलियां निकाली जाती हैं। यहां से निकाली गई और प्रोसेस की गई समुद्री मछलियां पूरे भारत में तो क्या पूरी दुनिया में भेजी जाती हैं। इस डॉक पर सैकड़ों की तादाद में मछलीमार नौकाएं खड़ी रहती हैं जिनमें शक्तिशाली मोटर लगा होता है और एक बड़ा सा मजबूत जाल भी होता है। समुद्री मछलियां छोटी से छोटी और बड़ी से बहुत बड़ी भी होती हैं। खुछ खास तरह की मछलियों को प्रोसेस करने के लिए यहां निजी कंपनियों के कई बड़े-बड़े प्लांट हैं जो प्रोसेस्ड मछलियों को फ्रीज करके सीधे विदेश भेज देती हैं। बाकी छोटी-बड़ी साधारण मछलियों को बर्फ के टुकड़ों के साथ बड़े-बड़े चौकोर डब्बों में पैक कर रेल से देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। बर्फ की सिल्लियों को तोड़ने के लिए वहां डॉक किनारे कई-कई क्रशर मशीन दिन भर काम करते रहते हैं। बिल्कुल छोटी-छोटी मछलियों को साफ करने के लिए दर्जनों की संख्या में महिलाएं सुबह से ही काम पर लग जाती हैं। मछुआरों और मछलियों की सफाई, धुलाई, प्रोसेसिंग, पैकिंग, लदाई, ढुलाई आदि में लगे सैकड़ों लोगों की इस डॉकयार्ड पर भीड़ लगी रहती है। उनकी रोजी-रोटी इसी डॉक से जुड़ी होती है। मछलियों से भरे पैक किए बड़े-बड़े डब्बे ठेलों पर लादकर चर्च गेट और वीटी स्टेशनों पर ले जाया जाता है जहां ट्रेनों के लगेज में इन्हें देश के विभिन्न हिस्सों के लिए बुक करा दिया जाता है। वहां डॉक पर बिल्कुल ट्राफिक जाम वाली स्थिति होती है। फिर इस मछली कारोबार से जुड़े कामगारों की सेवा करने के लिए चाय बेचनेवाले, लकड़ी की पटरी पर बिठाकर हजामत बनानेवाले फुटपाथी नाई और कुछ डॉक्टर वगैरह भी अपना कारोबार चलाने के लिए यहां मौजूद होते हैं। पास के कुछ रेस्टोरेटों का कारेबार भी इन्हीं मछली कामगारों के भरोसे ही फलता-फूलता है। शुरू के दिनों में हमने वहां के उन मछुआरों और मछली कामगारों से इस मछली व्यवसाय और उनकी बारीकियों के बारे में जाना। इस पूरे कारोबार को समझने के लिए हम उन मछली प्रोसेसिंग प्लांटों को भी देख आए। ससून डॉक पर स्थित इन मछली प्रोसेसिंग प्लांटों में कुछ खास तरह की बेहद महंगी मछलियों को साफ करके उन्हें मिठाई पैक करनेवाले डिब्बों की तरह के गत्ते के डिब्बों में डालकर उनमें पानी भर दिया जाता है और उनहें फ्रीजर में डाल दिया जाता है। जब वे जम जाते हैं तो उन्हें एक कार्टून में पैक करके माइनस-20 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले कमरे में स्टोर कर लिया जाता है। फिर उन्हें डीप फ्रिजर लगे ट्रकों में लोड कर शिप पर पहुंचाया जाता है। शिप के अंदर बने डिप फ्रीजर में रखकर उन्हें दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा जाता है जहां वे बहुत महंगी दरों पर बिकती हैं। खाड़ी के देशों में इनकी बहुत मांग है।

एक बार कुछ मछुआरो ने हमें अपने साथ समंदर में अपनी मछलीमार नौका पर बिठाकर ले चलने का प्रस्ताव भी दिया। पर यह भी कहा कि साहेब आपलोग हमारे साथ समंदर में नहीं रह पाओगे। उन्होंने समंदर में मछली मारने के दौरान आनेवाली परिस्थितियों के बारे में भी बताया जो सुनकर काफी डरावनी लगी। मछुआरों ने बताया कि समंदर में उनका ट्रिप कम से कम एक हफ्ते का तो होता ही है, पर कभी-कभी मछलियां कम मिलने पर यह समय और दो-चार दिनों के लिए बढ़ भी जाता है। अगर उनकी नौका कुछ ही समय में मछलियों से भर जाती है तो वे जल्ही यानी तीन-चार दिनों में ही लौट आते हैं। समंदर में उतरते समय यानी ट्रिप पर जाते समय वे अपने साथ पर्याप्त भोजन सामग्री मसलन आटा-चावल, नमक-तेल-मसाले, हरी सब्जियां, जरूरी बरतन, बाल्टी, माचिस, स्टोव, पर्याप्त किरासन तेल और डीजल, कपड़े, बिछावन और कुछ जरूरी टूल्स वगैरह ले जाते हैं। वे अपने साथ एक रेडियो सेट भी ऱखते हैं जिसपर वे कठिन समुद्री परिस्थितियों में मौसम विभाग की सूचनाएं और संबंधित चेतावनियां सुनते रहते हैं। मछुआरों ने बताया कि कुछ ऐसी मछलियां हैं जो काफी महंगी बिकती हैं और विदेशों में भेज दी जाती हैं यानी उनका अक्सर निर्यात ही होता है। अगर उन्हें ऐसी मछलियां मिल जाती हैं तो उनकी कमाई काफी बढ़ जाती है। अगर ऐसी मचलियां ज्यादा मात्रा में मिल जाती हैं तब तो उनकी बल्ले-बल्ले हो जाती है। उन्होंने ऐसी मंहगी मछलियां भी हमें दिखाई।

कोलाबा में समंदर किनारे के वुड हाउस रोड पर मछुआरे मछली पकड़ने में इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक की रंग-बिरंगी पतली-पतली रस्सियों से बड़े-बड़े जाल भी बुनते नजर आ जाते थे। कुछ मछुआरे नियमित तौर पर जाल बुनने का ही काम तरते हैं। ऐसे मछुआरों का पूरा परिवार जाल बनाने में स्यस्त रहता है। वहां समंदर किनारे खूंटे गाड़कर इन जालों को काफी चौड़ाई में बुना जाता है। जाल बनाने वाले एक मछुआरे ने ही बताया था कि वहां इन मछलीमार जालों की अच्छी खासी मांग रहती है और वे इसी से पर्याप्त कमा लेते हैं जिससे उनका परिवार चल जाता है।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....