शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 39

एक पत्रकार की अखबार यात्रा की उनतालीसवीं किस्त

पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 39

91. एक्सप्रेस की हड़ताल से उठते मुद्दे

इंडियन एक्सप्रेस की 1987 की वह हड़ताल एक अभूतपूर्व हड़ताल थी जो सिर्फ एक्सप्रेस ही नहीं देश की पूरी मीडिया इंडस्ट्री की आखिरी हड़ताल साबित हुई। यह हड़ताल बोनस को लेकर हुई थी। अखबार प्रबंधन 15 प्रतिशत बोनस देने को तैयार था और हडताली बोनस को 20 प्रतिशत करने की मांग कर रहे थे। ईमानदारी से अगर कहें तो बोनस उद्योग मालिक की खुशी पर निर्भर होता है। नियमानुसार बोनस 8.33 प्रतिशत देने की तब अनिवार्यता थी। श्रम कानूनों के तहत उस समय हड़ताल करना किसी भी श्रमिक का कानूनी अधिकार होता था। उसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही यह अभूतपूर्व हडताल हुई थी। यहां एक राय यह भी उभरती है कि कानूनन जब यही नियम था और यही वास्तविकता भी थी तो फिर यह हड़ताल हुई ही क्यों। इसीलिए कुछ लोग आज भी कह रहे हैं कि इस हड़ताल का मुद्दा असल में क्या था यह आज तक कभी साफ नहीं हुआ। हडताल को तुड़वाने वाले भी पुरस्कृत हुए और हडताल करने वाले और संपादक को भी न बख्शने वाले को भी बख़्शीश मिली। एक उद्योग के अंदर बोनस के मुद्दे पर प्रबंधन और श्रमिकों में ठनती है। लेकिन इतने छोटे मुद्दे को क्यों फिर इतना बडा क्यों बना दिया गया?

आज भी संस्थान के ही कुछ पत्रकार सवाल उठा रहे हैं कि कहीं भी इस पर ध्यान नहीं दिया जा सका कि हडताल के दौरान भी इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता निकलता रहा। यह क्या कंपनी की कोई रणनीति थी और कौन लोग ऐसा कर और करा रहे थे? इस सबकी वजह क्या थी? अखबारों को अखबारों के डीलर कुछ फोटो सेशन के लिए जला भी रहे थे। इस हडताल में एक राजनीतिक दल विशेष के नेताओं ने क्यों शिरकत की? इस हड़ताल में सत्ता का क्या रुख था? इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन पर सत्ता ने क्या कुछ आरोप लगाए थे? इन सवालों पर भी सोचा, समझा और लिखा जाना चाहिए। वैसे सच तो यही है कि श्रमिक हड़तालों को राजनैतिक दल एक अर्से से इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इन सभी बातों की पड़ताल के लिए एक रिसर्च की जरूरत तो है ही। आज जो श्रमिक कानून हैं वे सिर्फ दिखावे के रह गए हैं। लेकिन अखबारी दुनिया की इस आखिरी हडताल की बुनियादी बातों पर पूरी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। यह हडताल मीडिया की आखिरी हड़ताल रही। इसके बाद तो तमाम अखबार मालिक और मैनेजर खासे ताकतवर भी होते गए। यूनियनें, खासकर कुछ प्लांट यूनियनें आज आखिरी सांसें ले रही होंगी। पत्रकार संगठन भी तो अब केवल लेटरहेड पर ही बचे हैं। अखबारों के दफ्तरों की ये कर्मचारी यूनियनें अब अपनी किस तरह की भूमिका अदा करेंगी कहना मुश्किल है। इन यूनियनों के लोग क्या अब अपनी बनाई प्रोपर्टी को सहेजेंगे या फिर किसी और तरीके से कुछ करेंगे? दक्षिण भारत में तेलंगाना और हैदराबाद में अभी आईजेयू मजबूत दिखता है। इसी तरह की स्थित केरल में और तमिलनाडु में भी दिखती है। पांडिचेरी और उत्तर पूर्व में खासकर असम में राष्ट्रीय अखबारों और पीटीआई में कुछ एक्टिविटी होती जरूर दिखती है। लेकिन वहां भी उदासीनता भयानक है। कुछ साल पहले सैकड़ों पत्रकारों-गैर पत्रकारों को एक साथ नौकरी से निकाल दिए जाने का विरोध तो हुआ पर आज तक उन कर्मचारियों को नौकरी पर वापस नहीं लिया गया है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश मे कहीं कोई यूनियन नहीं जान पडती।

दूसरी तरफ किसी भी हड़ताल में मजदूरों की भागीदारी शत प्रतिशत नहीं होती है।  हो भी नहीं सकती। इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल तो वैसे भी कथित रूप से कांग्रेस ने कराई थी, भले ही बाद में पता चला कि संपादक (अरुण शौरी) भाजपा और आरएसएस के कितने करीबी थे। हड़ताल के पीछे मुद्दा तो बोनस और अन्य मांगें ही थीं। ये मांगें बाकायदा यूनिनन ने की थी और वह एक सही-सच्ची हड़ताल थी जिसे प्रचारकों ने बदनाम किया और कंपनी के साथ जो प्रचारक और संघ के लोग थे उनकी भूमिका देख-याद कर लीजिए उससे सब कुछ साफ हो जाता है। उन्हें यूनियन की मांग या फिर कर्मचारियों की जरूरतों से कोई लेना-देना ही नहीं था। हताशा में हड़तालियों ने हिंसा का सहारा लिया और मारे गए। 

हड़ताल तोड़ने की कोशिशें इतने साल बाद अब बताती हैं कि यह मामला संघ और कांग्रेस का आपसी मामला हो सकता है। आज इतने साल बाद भी इसपर उठे सवाल कायम तो हैं। जहां तक हड़ताल के दौरान अखबार निकलने की बात है तो कहने की जरूरत नहीं है कि उस समय आज की तरह तकनीक नहीं होने के कारण मैनेजमेंट की वह कोशिश बुरी तरह नाकाम रही थी। मुद्दे की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 'स्वतंत्र प्रेस' ने अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के मुताबिक वेतन नहीं दिया और कंपनी के समर्थक विपक्ष ने वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने में कोई भूमिका नहीं निभाई।

92. जनसत्ता आखिर जनसत्ता क्यों था

जनसत्ता अगर जनसत्ता था तो सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी की वजह से था। जनसत्ता के अच्छे होने का श्रेय अगर किसी और को दिया जा सकता है तो इस बात को कि यह इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का अखबार था या फिर यह कि इसके मालिक रामनाथ गोयनका थे। जनसत्ता की टीम को भी इसकी कामयाबी का श्रेय जाता है पर यह इंडियन एक्सप्रेस समूह की साख और प्रभाष जोशी के स्टाफ सेलेक्शन से भी संभव हुआ था। प्रभाष जोशी के चुनाव में विविधताएं थीं और खुद भी वे अखबार के सारे काम जानते थे और बहुत ही अच्छे ढंग से उसे करते भी थे। अखबार के दैनिक कामकाज से उनका खासा जुड़ाव था और जनसत्ता में कितने ही चर्चित शीर्षक उन्होंने खुद लगाए थे। अखबारों में खबरों के शीर्षक कौन लगाता है और जो लगाता है उसे इसका श्रेय देने का कोई रिवाज नहीं है पर जनसत्ता में कई बार वे बड़े आराम से ऐसे शीर्षक लगा देते थे जो अच्छे होने के साथ-साथ पूरी खबर को बयान कर देते थे और संबंधित खबर के लिए सर्वश्रेष्ठ शीर्षक हो सकते थे। वैसे तो यह सब जानी हुई बातें हैं पर जिन लोगों ने जनसत्ता नहीं पढ़ा है उनके लिए यह सब पढ़ना और जानना एक अजूबा ही होगा।

जनसत्ता के शुरुआती दिनों के हमारे साथी दयानंद पांडेय ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अख़बार छपने के शुरुआती दिनों की बात है। प्रभाष जोशी जी जनरल डेस्क पर बैठे कोई ख़बर लिख रहे थे। उनकी आदत सी थी कि जब कोई ख़ास घटना घटती थी तो वे टहलते हुए जनरल डेस्क पर आ जाते थे और ‘हेलो चीफ सब!’ कह कर सामने की एक कुर्सी खींच कर उसी पर किसी उप संपादक की तरह बैठ जाते थे। फिर वे चीफ सब से उस संबंधित ख़बर से जुड़े तार (टेलीप्रिंटर से आई समाचार एजेंसियों की खबरों के टेक यानी टुकड़े) मांगते और ख़बर लिखने लग जाते। खबर लिख कर शिफ्ट इंचार्ज यानी चीफ सब एडीटर को देते हुए कहते, ‘जैसे चाहिए इसका इस्तेमाल करिए।’ जोशी जी की आदत थी कि जब वे कोई ख़बर लिख रहे होते या कुछ और भी लिख रहे होते तो डिस्टरवेंस बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। पर उस दिन वे लिख रहे थे तभी एक फ़ोन आ गया। फोन मनमोहन तल्ख़ ने रिसीव किया और प्रभाष जी को बताया कि, ‘मोहसिना किदव ई जी का फ़ोन है।’ ‘यह कौन हैं?’ जोशी जी ने बिदक कर पूछा। ‘यूपी के बाराबंकी से सासंद हैं।’ मनमोहन तल्ख़ ने अपनी आदत और रवायत के मुताबिक़ उसमें जोड़ा, ‘बड़ी खूबसूरत महिला हैं।’ ‘तो?’ जोशी जी और बिदके। बोले, ‘कह दीजिए बाद में फ़ोन करें।’ लेकिन पंद्रह मिनट में जब कोई तीन बार मोहसिना किदवई ने फ़ोन कर दिया तो जोशी जी को फ़ोन पर आना पड़ा। दरअसल, मोहसिना किदवई के खि़लाफ जनसत्ता में बाराबंकी डेटलाइन से एक ख़बर छपी थी। उसी के बारे में वे जोशी जी से बात कर रही थीं। वे उधर से जाने क्या कह रही थीं, जो इधर सुनाई नहीं दे रहा था। पर इधर से जोशी जी उनसे जो कुछ कह रहे थे वह तो हमें साफ-साफ सुनाई दे रहा था। जाहिर है मोहसिना किदवई जी उधर से अपने खि़लाफ ख़बर लिखने वाले जनसत्ता के रिपोर्टर की ऐसी तैसी करती हुई उन्हें हटाने की तजवीज दे रही थीं। पर इधर से प्रभाष जोशी जी अपनी तल्ख़ आवाज़ में उन्हें बता रहे थे कि, ‘रिपोर्टर जैसा भी है उसे न आपके कहने पर रखा गया है, न आपके कहने से उसे हटाया जाएगा। रही बात आप के प्रतिवाद की तो आप उसे लिख कर भेज दीजिए, अगर ठीक लगा तो वह भी छाप दिया जाएगा।’ उधर से मोहसिना किदवई ने फिर कुछ कहा तो जोशी जी ने पूरी ताकत से उनसे कहा कि, ‘जनादेश की बात तो हमें आप समझाइए नहीं। आप पांच साल में एक बार जनादेश लेती हैं तो हम रोज जनादेश लेते हैं। और लोग पैसे खर्च करके अख़बार ख़रीदते हैं और जनादेश देते हैं। बाक़ी आपको जो कुछ भी करना हो आप कर सकती हैं, इसके लिए आप स्वतंत्र हैं।’ इतना कह कर प्रभाष जी ने फ़ोन रख दिया। जनता द्वारा अख़बारों को दिए गए इस जनादेश की ताकत का इस तरह बखान सिर्फ और सिर्फ संपादक प्रभाष जोशी ही कर सकते थे। आज के समय में विज्ञापन को ख़बर बता कर, पैसे लेकर ख़बर छापने वाले संपादक किस बूते पर और किस मुंह से अखबार और कलम की इस ताकत का बखान कर सकते हैं?

एक दूसरा वाकया बिहार का है। बिहार में उन दिनों लालू यादव की सरकार थी। पटना से बिहार के विशेष संवाददाता थे सुरेंद्र किशोर। लालू यादव और सुरेंद्र किशोर साथ ही पढ़े थे। पर यह सर्वविदित था कि खबर लिखने में सुरेंद्र किशोर कभी किसी के प्रति कोई सॉफ्ट कार्नर नहीं रखते थे। वे किसी को नहीं छोड़ते थे। सुरेंद्र किशोर की खबरों से लालू यादव खासे परेशान रहते थे। एक बार लालू यादव ने प्रभाष जोशी जी को फोन करके सुरेंद्र किशोर की भर पेट शिकायत की और कहा कि “आपका रिपोर्टर सुरेंद्र किशोर हमेशा मेरे खिलाफ उलूल जलूल लिखता रहता है, उसे आप नौकरी से निकाल दीजिए।” इसपर प्रभाष जी ने लालू यदव से ठीक वही लाइन कही कि “न तो सुरेंद्र किशोर को हमने आपके कहने से रखा है और न हम आपके कहने से उनको हटाएंगे। आपको अपने बारे में छपी खबरों पर अगर कुछ कहना है तो उसे आप लिखकर भेज दीजिए, जरूरी लगा तो हम उसे भी छाप देंगे।” प्रभाष जोशी के साहस की इस तरह की और भी कई कहानियां हैं।

जनसत्ता  यानी न भूतो, न भविष्यति। हिंदी पट्टी में ख़बरों के मामले में जनसत्ता जैसा तल्ख तेवर वाला अख़बार पहले कभी देखा नहीं गया था और आज तक भी ऐसा कोई अखबार नहीं आया है। यही वजह रही जो चंद दिनों में ही जनसत्ता ढाई लाख की प्रसार संख्या को पार करने लगा। कभी मीटिंग में उन दिनों जोशी जी बताते नहीं अघाते थे कि उस समय देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अख़बार पश्चिम बंगाल से छपनेवाला बांग्ला भाषा का अखबार आनंद बाज़ार पत्रिका था। प्रभाष जी उस समय उसकी प्रसार संख्या सात लाख बताते थे और कहते थे कि अगर बांग्ला में कोई अख़बार सात लाख बिक सकता है तो फिर हिंदी में क्यों नहीं? पर उन्हीं दिनों प्रभाष जोशी को जनसत्ता में एक विशेष संपादकीय लिखकर पाठकों से निवेदन करके कहना पड़ा कि “कृपया अब जनसत्ता ख़रीद कर नहीं, मांग कर पढ़िए। हम अब इससे ज्यादा नहीं छाप सकते।” इस पर प्रभाष जी दफ्तर में मीटिंग में अंदर की बात बताते थे कि मालिक रामनाथ गोयनका जी ने जनसत्ता की इस बढ़ती मांग पर उनसे कहा है कि या तो दो मशीनें लगाकर अख़बार अब पांच लाख छापिए या फिर उसे यहीं ढ़ाई लाख पर रोक दीजिए। बीच का कोई रास्ता नहीं था इसलिए जनसत्ता को ढाई लाख पर ही रोक देना पड़ा। अख़बार की छपाई, कागज का खर्च और व्यापार की लाभ-हानि का यह एक तकनीकी गुणा भाग था।

93. अंग्रेजी अखबारों का जूठन नहीं था जनसत्ता

जनसत्ता का प्रकाशन जब शुरू हुआ तो जनसत्ता के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता की धरती पर प्रभाष जोशी नाम का एक देदिप्यमान सूरज भी उदित हुआ। जनसत्ता और उसके यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी दोनों की चमक उन दिनों देखने लायक़ होती थी। एक दूसरे की चमक से दोनों ही आप्लावित थे। दिल्ली की मीडिया में वह भी उन दिनों एक ग़ज़ब का मंजर हुआ करता था। जो भी अखबार देखता था वह जनसत्ता और उसके संपादक के रूप में प्रभाष जोशी का नाम देखता था और तब वह बरबस ही पूछ बैठता था कि, ‘यह आदमी अब तक कहां छिपा हुआ था।’ हिन्दी में यह नाम तो पहले भी था पर इतनी चमक और धमक उसके हिस्से नहीं थी और इसीलिए लोग प्रभाष जोशी को नहीं जान पाए थे। उन दिनों हिन्दी में लोग सिर्फ धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, अज्ञेय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, राजेंद्र अवस्थी, कन्हैयालाल नंदन, अक्षय कुमार जैन,  गोपाल प्रसाद व्यास, इलाचंद्र जोशी, मोहन राकेश, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, महेश्वर दयालु गंगवार, रामानंद दोषी और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसे साहित्यकारों को ही जानते और मानते थे। लगभग ये सभी लोग हिन्दी पत्रिकाओं के संपादक थे। हिन्दी के दैनिक अख़बारों के संपादकों की उन दिनों कोई हैसियत ही नहीं समझी जाती थी। उन दिनों हिन्दी के सभी दैनिक अख़बारों की हालत बिल्कुल दरिद्रता वाली थी। प्रभाष जोशी नाम के सूरज ने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की धरती पर जो रोशनी फैलाई, उसे जो ऊष्मा प्रदान किया और उसके पटल पर जो सुंदरता विखेरी वह अविरल, अद्भुत और अविस्मरणीय थी।

हमेशा से अंगरेजी अख़बारों की जूठन और उतरन पर जीने खाने वाली हिन्दी पत्रकारिता को दरअसल प्रभाष जोशी के संपादन में निकलने वाले जनसत्ता ने अंगरेजी अख़बारों के उस जूठन और उतरन के सहारे जीने से मना कर दिया था। प्रभाष जोशी ने अंगरेजी अख़बारों के छिछले अनुवादों से पटे पड़े हिंदी के अख़बारों के संपादकीय या संपादकीय पेज वाले लेखों में अंगरेजी अख़बारों के कचरे से पूरी तरह छुट्टी दिला दी। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स के प्रबंधन ने हिन्दी पत्रकारिता में अचानक आए इस बदलाव की समय रहते पहचान कर ली थी और इंदौर के प्रतिष्ठित अखबार नई दुनिया से राजेंद्र माथुर को लेकर आ गए थे। प्रभाष जोशी भी इसी अखबार से निकलकर आए थे। जो काम प्रभाष जोशी जनसत्ता में कर रहे थे, वही काम राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स में आकर किया करते थे। शायद दोनों की पृष्ठभूमि एक होने की वजह से ही यह एकरूपता थी। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी दोनों में कई बातें एकसमान थीं। पत्रकारिता की समझ, लिखने की क्षमता और हिंदी पत्रकारिता को बदल डालने की बेचैनी इन दोनों पत्रकारों में कूट-कूट कर भरी हुई थी और वह दूर से भी दिखाई दे जाती थी।हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप का हिन्दी अखबार हिन्दुस्तान तो बहुत बाद में नींद से जागा था। तब तक हिन्दी पत्रकारिता की नदी में काफी पानी बहा दिया जा चुका था।हिन्दुस्तान को तो नकल करनेवाला अखबार ही माना गया।

प्रभाष जोशी को जनसत्ता में स्टाफ रखने से लेकर ख़बर और कंटेंट तक की जितनी आजादी मालिक से मिली हुई थी उतनी किसी और अखबार के संपादक को नहीं थी। जैसे जब केंद्र में कोई प्रधानमंत्री या राज्यों में मुख्यमंत्री अपनी कैबिनेट बनाता है तो क्षेत्रीय संतुलन और जातीय संतुलन का ध्यान रखते हुए अपने करीबियों का भी खयाल रखता है। साथ-साथ वह अपनी पसंद और नीति को भी ध्यान में रखता है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में नियुक्तियां करते समय बहुत कुछ यही किया था। जनसत्ता में वे हर क्षेत्र के लोगों को लेकर आए थे। जनसत्ता में हर तरह के लोग थे। हमारे एक साथी बालासुंदरम गिरि हिन्दी में भले उन्नीस थे पर वे तमिल के जानकार थे। जनसत्ता में मराठी और उर्दू जानने वाले साथी भी लिए गए थे। दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से भी लोग लाए गए थे। बहरहाल प्रभाष जोशी जी की किचेन कैबिनेट में तब दो ही लोग थे। बनवारी और हरिशंकर व्यास। दोनों लोग बिना किसी लिखित परीक्षा के लिए गए थे। ये दोनों लोग प्रभाष जोषी की आंख और कान थे। पर थे दोनों एक दूसरे के पूरी तरह उलट। बिल्कुल दो ध्रुव। बनवारी जी सर्वोदयी थे तो हरिशंकर व्यास संघी। बनवारी जी खादी पहनने वाले तो हरिशंकर व्यास पालिएस्टर। दोनों की सोच समझ में भी बहुत का फर्क था। ज़मीनी हकीकत भी दोनों के अलग-अलग थे। इस तरह जनसत्ता में कुल तीन धाराएं थीं। तीनों बेजोड़। शायद इसी विचित्र कांबीनेशन की वजह से जनसत्ता अखबार जनसत्ता ब्रांड बन पाया था।

जनसत्ता का एक स्लोगन यानी नारा था- सबकी खबर ले, सबको खबर दे । इसे हमारे साथी कुमार आनंद ने रचा था। प्रभाष जोशी जी ने एक मीटिंग बुलाकर सभी साथियों से जनसत्ता के लिए एक-एक स्लोगन लिखने को कहा। यह भी कह दिया कि स्लोगन को कविता के अंदाज में लिखा जाना चाहिए। सभी ने इसे बड़े उत्साह से लिखा। पर कुमार आनंद का लिखा स्लोगन ही पास हुआ। प्रभाष जोशी जी को सबसे ज़्यादा यही स्लोगन पंसद आया। फिर तो देश भर में जनसत्ता के लिए लगाए गए तमाम होर्डिंग्स पर और विज्ञापनों में भी यही स्लोगन लिखा गया। यही स्लोगन आम फहम हो गया। उन दिनों जनसत्ता सबकी ख़बर ले, सबको ख़बर दे का एक पर्याय बन गया था। देश के हर खासो-आम को उन दिनों जनसत्ता के पन्नों में अपनी आवाज़ सुनाई देती थी और अपना चेहरा दिखाई देता था। जनसत्ता को उन दिनों लोग रामनाथ गोयनका या फिर इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का अख़बार नहीं, प्रभाष जोशी का अख़बार जानते थे। हिन्दी पत्रकारिता के पटल पर यह एक अविश्मरणीय और बहुत बड़ी घटना थी। पहली बार किसी अंग्रेजी संस्थान में हिंदी की तूती इस तरह बजी कि न भूतो न भविष्यति। खासियत यह भी थी कि जनसत्ता अख़बार और पत्रिका दोनों का मज़ा एक साथ देता था। यह चीज उस समय हिन्दी पत्रकारिता में कहीं और नहीं थी। जनसत्ता में सप्ताह के दो-दो दिन ख़ास ख़बर और खोज ख़बर का फीचर पेज होता था। इसके अलावा एक-एक दिन खेल, कला और सिनेमा का पेज भी बनता था। और हर रविवार को पूरे चार पन्नों का साहित्य रविवारी जनसत्ता । इन पन्नों के जरिए देशभर की जनपदीय और मुफस्सिल की पत्रकारिता से जुड़ने और वहां के लोगों को अखबार से जोड़ने का यह अद्भुत और एक दुर्लभ प्रयोग किया गया था। इसमें अखबार के संवाददाताओं के अलावा भी कोई भी लेखक-पत्रकार किसी भी विषय पर किसी भी तरह का प्रामाणिक ख़बर लिख कर बेहिचक और आराम से छप सकता था। यह प्रयोग बहुत सफल रहा और इस तरह जनसत्ता में लोग खूब छपे। इससे भी जनसत्ता को खूब ख्याति मिली। उन दिनों कलकत्ता से छपने वाली आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप की हिन्दी समाचार पत्रिका रविवार ने हिंदी पत्रकारिता में जो तेवर और जो रवानगी पिरोई थी उसी तेवर और रवानगी को जनसत्ता ने परवान चढ़ा दिया।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....


शनिवार, 24 सितंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 38


एक पत्रकार की अखबार यात्रा की अढ़तीसवीं किश्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 38


90. इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल का मुकदमा भी दिलचस्प  

इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल को लेकर जमकर मुकदमेबाजी भी हुई थी। निचली अदालत से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक में केस चले। हड़ताल का यह मुकदमा भी बड़ा दिलचस्प रहा है। इससे देश के पत्रकारों, मीडिया घरानों और ट्रेड यूनियनों की मंशा और उनकी अंदरूनी राजनीति को काफी हद तक समझा जा सकता है। इस संदर्भ में आइए देखते हैं दिल्ली हाईकोर्ट में हड़ताल के इस दिलचस्प मुकदमे में विभिन्न पक्षों ने क्या-क्या दलीलें रखी और उनकी दलीलों पर हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कुछ कहा।

Delhi High Court

Indian Express Newspapers ... vs T.M. Nagarajan And Ors. on 4 December, 1987.

Equivalent citations: 1987 (15) DRJ 212, 1988 LablC 1067, 1988 RLR 194.

Author: S Sapra

Bench: S Sapra

JUDGMENT S.N. Sapra, J.

(1) Indian Express Newspapers (Bombay) Pvt. Ltd., the present plaintiff, has filed a suit for permanent and mandatory injunction whereby claiming a decree to restrain the defendants, their agents and supporters from picketing, demonstrating and gheraoing employees of the plaintiff company and from demonstrating within a distance of 200 meters from the entrance of the Express Building at Delhi and to further restrain the defendants, their agents and associates from preventing the ingress and egress of any employee of the plaintiff company, who wishes to enter the office of the plaintiff company. Along with the suit, the plaintiff filed an application being I.A. 8869/87 under Order 39 Rules I and 2 read with Section 151 of the Code of Civil Procedure for grant of ad interim temporary injunction thereby restraining the defendants from picketing, demonstrating within a distance of 200 meters from the gate of the Express Building, and also from assaulting or gheraoing any employee of the plaintiff company as also directing the Commissioner of Police and the S.H.O., Darya Ganj Police Station, to enforce the order passed in terms of the above prayer and further directing him to remove the tent of the defendants pitched at the entrance of the Express Building. Vide order dated 27th November, 1987, I granted ex parte ad interim injunction thereby restraining "defendants themselves or their agents or supporters are hereby restrained from preventing the ingress and egress of any employee of the plaintiff company who wishes to enter the office of the plaintiff company. Defendants, are further restrained from picketing within 50 metres of the Express Building situated at Bahadur Shah Zafar Marg, New Delhi." After service of the stay order, the defendants have moved an application being I.A. 8945/87 under Order 39 Rule 4 read with Section 151 of the Code of Civil Procedure for vacation of the ex parte stay order dated 27th November, 1987.

(2) Facts giving rise to the institution of the suit have been mentioned in detail in the plaint. In brief the facts are that the Delhi Establishment of the plaintiff company publishes Indian Express, Jansatta and Financial Express dailies from its premises situated at Bahadurshah Zafar Marg, New Delhi where the printing units as well as the editorial and administrative offices are situated. Since 14th October, 1987. it is alleged by the plaintiff, a small number of employees led by an outsider Mr.T.M Nagarajan have staged a strike and have from day-to-day physically prevented an overwhelming majority of employees from entering the premises and attending to their duties. The methods adopted to prevent the entry of employees included making it physically impossible for the employees to get into the building by forming human walls, by abuses, by physical assaults, by strone-throwing etc. It is further alleged in the plaint that the defendants along with their supporters have positioned themselves by pitching a tent right at the entrance of the building and have spread themselves on the steps leading to the building and on the platform or chabutra inside the building. This is despite the fact that by an order of permanent injunction dated 20th January, 1987 the Court of the Sub Judge, New Delhi has restrained the defendants from demonstrating, picketing and gheraoing any person within 50 yards from the entrance of the Express Building. In the plaint it is further alleged that the defendants and their supports have indulged in various acts of violence and intimidation against individual employees of the plaintiff company. Many of them have been beaten and some of whom have been hospitalised with head injuries. Despite such intimidation and physical threat, over 350 employees of the plaintiff company entered the building on 28-10-1987 and made efforts to bring out the edition. However, the defendants along with their supporters successfully thwarted food supplies to these 350 employees inside with the result that the plaintiff' company was forced to call off the operation of bringing out the publication and pull out the employees under police escort. It is alleged that a majority of the executive members of the Indian Express Employees Union (hereinafter referred to as 'the Union') requisitioned a General Body Meeting of the members of the Union on 18-11-1987. The meeting was attended by 410 members and it was unanimously resolved to remove Mr. Nagarajan from the Presidentship, appointed a Negotiating Committee to carry on discussions with the management on their demands and called off the strike. It is alleged that after the strike had been called off, a small minority of 20 to 25 persons with the help of outsiders are successfully preventing the overwhelming majority of the employees of the plaintiff company from resuming their work. The defendants by their various acts of violence have successfully thwarted publication of Indian Express, Jansatta and Financial Express from October 14, 1987 and despite the fact that defendant No, I has been removed from the President of the Union he is organising criminal assaults on the workers of the plaintiff company and is with the help of outside elements and other defendants physically preventing the workers from attending their offices. In the plaint, it is also alleged that on November, 23, 1987 a comprehensive settlement was reached between the management and the Union represented by Mr. R.K. Dogra, working President and Mr. C.M. Papnai, General Secretary and five other members of the Negotiating Committee appointed by the General Body at its Meeting held on 18th November, 1987 whereby extensive benefits were conferred on the employees. The grievance of the plaintiff is that despite the fact that all grievances have been settled and the overwhelming majority of the employees have sacked the first defendant as the President of the Union and want to resume work. the defendants, by picketing at the entrance of the Express Building are preventing ingress and egress of the employees who want to go into the building and come out a.nd, thus, prevent the publications from coming out in Delhi.

(3) Defendants filed an application under Order 39 Rule 4 read with Section 151 of the Code of Civil Procedure being 1.A. 8945/87 for vacation of the stay. In this application the defendants have alleged that with a view to obtain an ex parte injunction order against the defendants, the plaintiff has made gross mis-representation of facts, suppression of material circumstances and abuse of process of law. It is alleged that defendant No. 1 is the President and defendant No. 6 is the acting General Secretary of the Union. 18 out of 23 executive members are backing up the strike called by the Union for settlement of the grievances, namely, "parity in the payment of bonus between the Delhi Office and the Bombay Office ; the payment of medical allowance, leave travel allowance, educational allowance, canteen allowance and other facilities". It is alleged that the Union was compelled to resort to indefinite strike because the Management kept on refusing to negotiate on the demands. All the executive members and the office bearers are duplected by the General Body in its election held on 20-1-1987. It is further alleged that instead of negotiating with the Union, the Management resorted to unfair labour practice of breaking away the Executive members of the Union. The executive committee expelled four of its members, namely. Shri Bharat Bhushan Bawa, Shri R.K. Malhotra, Shri Devi Prasad and Shri B.K. Bhatia for their anti-union and pro-management activities. The defendants denied the allegations made by the plaintiff and have alleged that Shri R.K. Dogra and Shri C.M. Papnai are not the working President and the General Secretary respectively of the Union and more so they stood expelled from the union by the decision dated 15-11-1987. It is further alleged that it is false on the part of the plaintiff to allege that defendant No. 1 was expelled from the Presidentship of the Union. It is alleged that the plaintiff suppressed the fact that the defendants have filed a suit seeking declaration that the union represented by defendant No. 1 is the real union and further seeking injunction against expelled members from acting/representing on behalf of the Union. This suit is pending in the Court of Shri Akshay Kumar Sub Judge, Delhi. Notice has been issued for 1-12-1987. It is further alleged that the plaintiff has also suppressed the fact that it has moved before the learned Sub Judge Shri Pawan Kumar for police protection in preventing the Union members from picketing the force from the Express building and the same was refused. It is alleged that the restriction of 50 metres as imposed by the order of this court dated 27-11-1987 is unreasonable because the distance of 50 metres from the Express building would fall either on the main road or elsewhere on the side of the other buildings where various offices are being run. This will virtually amount to preventing the Union from resorting to a strike which is a recognised mode of seeking settlement der the Industrial Disputes Act, 1947. The defendants also filed a written statement in suit and reply to the interim application, 1.A. 8869/87. In the written statement it is alleged that Section 9 of the Civil Procedure Code bars the jurisdiction of the civil court to entertain the present suit. Issues involved in the suit pertain to the strike which can be adjudicated only under the Industrial Disputes Act, 1947. The defendants denied the allegations made by the plaintiff. It has been alleged in the written statement by the defendants that the employees are law abiding citizens and they have always believed in a peaceful mode of agitation. On 2-12-1987, at the time of starting arguments, the plaintiff has filed an affidavit of Shri P.C. Jain on behalf of the plaintiff. In this affidavit it has been deposed that over 500 employees of Indian Express, Jansatta and Financial Express peacefully entered their office at 9.00 A.M. in the morning on 1-12-1987. This was made possible only because of the interim injunction granted by this Hon'ble Court which enabled the police officials to remove the picketeers away from the entrance although the picketeers were not removed to a distance of 50 metres from the building. The work was going on smoothly. However, at about 1.30 A.M. a group of 15 persons from the tent pitched at the foot of the building pounced upon on eight journalists of Jansatta. They threw acid bulbs on two of them and another was attacked with sticks and iron rods. Three journalists, Shri Pradeep Kumar Singh, Shri Sanjay Singh and Shri Mahadeo Chauhan, were seriously injured. The police swung into action immediately and arrested Shri G.K. Tyagi, defendant No. 12, Shri Radhey Shyam, defendant No. 23. However, Shri Virender Prakash, defendant No. 20, is absconding. Several photographs have also been enclosed with this affidavit.

(4) A reply affidavit has also been filed by defendant No. 7 on 3-12-1987. In this affidavit, defendants have denied that members of the Union have indulged in any act of violence. It is deposed that they are peacefully demonstrating, picketing and pursuading strike breakers not to indulge in anti-Union activities. The defendants state that they solemnly undertake before this Hon'ble Court that no incidents of violence will be allowed from any member of the Union. They have further strongly condemned all acts of violence which can never be condoned in any civilized society. It is further alleged in this affidavit that the strike commenced on 14-10-1987 and the alleged incidents of extreme violence are said to have occurred only on 2-12-1987 when defendants' application for vacation of stay had already been filed and mentioned before the court for hearing.

(5) Mrs. S. Pappu, learned counsel appearing for the defendants, in the first place, contends that the present suit is not maintainable and the same is barred under the provisions as contained in the Trade Unions Act, 1926. She submits that it is the legitimate right of employees to go on strike. In the present case, the employees went on strike after serving a legal notice as required under Section 22 of the Industrial Disputes Act, 1947 as the demands of the employees were not accepted. The strike is a remedy under the Labour Laws including the Industrial Disputes Actand the Trade Unions Act for getting the genuine demands of the workers fulfillled or redressed. She submits that the Union is a duly registered and recognised Union and defendant No. 1 is the duly elected President of the same. The Union has a right to prevent a willing worker by persuasion with a view to maintain unity and parity of the workers' union. In the present case there is an industrial dispute. Defendants and other members of the Union have resorted to a peaceful strike which 'is legal. If there is a stay then how Union can maintain its unity and properly pursue its legitimate trade union activities and redress its grievance. The very object of the peaceful strike will be defeated. Strike is a right under industrial law and the plaintiff is seeking indirectly an injunction against such legal right of strike. This is restrictions are placed then even the peaceful strike will be ineffective. not the intention of either the legislature or the public policy. She submits that under section 18 of the Trade Unions Act, 1926 no suit or other legal proceeding shall be maintainable in any Civil Court against any registered Trade Union or any office bearer or member thereof in respect of any act done in contemplation or furtherance of a trade dispute to which a member of the Trade Union is a party on the ground only that such act induces some other person to break a contract of employment. She submits that the present disputes are fully covered by this section and the suit as such is barred and this court has no jurisdiction to entertain the suit. Reliance has been placed upon the judgment in The Premier Automobiles Ltd. v. Kamlekar Shantaiam Wudke Oj Bombay ar.cl oilers. . Relying on the said judgment, Mrs. Pappu urges that in the present case there has arisen an industrial dispute because the Union has certain demands and after serving notice, when such demands were not met, went on strike under the Industrial Law. According to her, The Premier Automobiles Ltd.'s case (supra) is applicable to the facts of the present case.

(6) In the second place, learned counsel for the defendants, urges that Article 19(c) of the Constitution of India gives a fundamental right to the workers to form union and association. This right includes right to go on peaceful strike. Reasonable restrictions can be placed on such right only by the legislature and not by either courts or executive authority. She has filed a rough plan/sketch thereby showing the Express Building situate at Bahadur Shah Zafar Marg, New Delhi and the surrounding roads and buildings. She submits that if this court imposes a restriction of 50 metres, the very right which has been given to the workers to go on peaceful strike shall be taken away. It will mean, according to her, that the workers will be on a strike or shouting peaceful slogans not in front of the premises of the employer but in front of another building. This restriction will, she submits, render the strike in question ineffective. Reliance has been placed on All India Bank Employees' Association v. The National Industrial Tribunal (Bank Disputes), Bombay and others, , Sri Rama Vilas Service Ltd. and another v. Simpson and Group Companies Workers' Union and another, (1979- Ii Llj 284) and S.D. Sharma \.TradeFairAuthorityoflndiaandothers,(1985-I Slr 670).

(7) The next contention made by Mrs. Pappu is that the plaintiff has made suppression of material facts when it is alleged in the plaint that defendant No. I has been removed from the Presidentship of the Union. This is because the matter is already subjudice in the Court of the Sub Judge, Delhi. However, in reply arguments, Mrs. Pappu, on behalf of the defendants (Defendant No. I also present) has given the following undertaking to the court on December 3,1987: "That defendants shall not physically prevent the ingress or egress of any willing worker to and from the Express Building situate at Bahadur Shah Zafar Marg Defendants shall not go in the service lane, i.e., the lane between the side of the Express building and the premises of Milap and also not go or move towards the other side and the back of the Express Building and also not go towards the side gates of the Express Building. Defendants will hold peaceful picketing or stage dharna in the middle of the railing and beyond the railing towards road, i.e., between the footstep of the staircase (leading to main entrance) and the corner of the Express Building towards service lane and may fix tent there. The entire railing is about 30.5 metres. Defendants have undertaken not to hold any picketing demonstration or stage dharna .within 15 metres from the foot-step of the staircase (leading to main entrance)."

(8) Mr. F.S. Nariman, Senior Advocate, appearing for the plaintiff, contends that certain dates are very relevant for appreciating the contentions now being raised by the plaintiff. Strike started on October 14 1987. Settlement with 600 workers was effected on November 23, 1987 and suit was filed on November 27, 1987. Mr, Nariman urges that the present suit is maintainable as cause of action for filing the present suit is not against the peaceful strike. He further submits that Section 18of the Trade Unions Act 1926 is not applicable to the facts and circumstances of the present case. He has invited my attention to the allegations made in the plaint, more particularly in parapraphs 3, 5 and 11. In paragraph 3 of the plaint, he submits, specific allegations of acts of violence on the part of the defendants and their supporters have been made. It is alleged that a small number of employees led by defendant No. 1 have physically prevented an overwhelming majority of employees from entering the premises and attending to their duties. It is alleged that there are incidents of physical assaults, abuse, stone-throwing, smashing of soda water bottles and acid bulbs. He submits that in the plaint, plaintiff has also alleged that defendants and their supporters have indulged in various acts of violence and intimidation and many of the employees have been beaten and some of them have been hospitalised with head injuries. The defendants are terrorising the individual employees from joining duty. He further contends in the affidavit filed on December 2, 1987 Mr. Jain has deposed that three journalists have been seriously injured and defendants No. 12,20 and 23 are involved. Two of them, namely, defendants 12 and 23, have already been arrested for the offence of attempt to murder. He has emphasised on the photographs submitted with this affidavit and the contents of F.I.R. So, according to him, the cause of action has arisen when defendants with the help of their supporters started preventing willing employees by violence and threat of assault and in fact assaulted various employees. He has contended that these are not only the allegations made in the plaint but sufficient documents have been placed on record to prima fade show that acts of violence, assault, intimidation etc. on the part of the defendants and other employees. He has invited my attention to various documents which have been placed by the plaintiff on record. These documents are from pages 41 to 71 of the documents file. He has taken me through these documents which are various complaints having been made by plaintiff to various authorities including S.H.O., Darya Ganj, Commissioner of Police, Home Minister, Lt. Governor etc. In these communications, plaintiff has alleged various acts of violence, intimidation, physical assault etc. on the part of a section of the Indian Express employees. He urges that at this stage the court is to see whether prima fade plaintiff has been able to show that the strike is peaceful or there are acts of serious violence on the part of defendants and their supporters. Reliance has been placed on the judgments in M.P. Colliery Workers Federation, Chirimiri v. United Collieries Ltd., Calcutta, (1972-M.P.L.J. 78), Reserve Bank of India v. Ashis Kusum Sen and others, (73 Cal. W.N. 388) and Jay Engineering Works Ltd. and others v. State of West Bengal and others, ). He, therefore, argues that not only there are threats of violence but there is sufficient documentary evidence on record in support of such allegations. So, the suit is maintainable and the Civil Courts have the jurisdiction to interfere in the matter and protect the interest of the plaintiff.

(9) In the second place, Mr. Nariman contends that the defendants have continuously disobeyed the orders of this court. After the service of stay order issued by this court, defendants have physically assaulted the three journalists seriously and they have been hospitalised. Cases against three defendants have been registered for the offence of attempt to murder and two defendants have been arrested and the third one is absconding. As there is disobedience of the order issued by this court on the part of defendants, so defendants cannot be heard. He further submits that even on the rough plan/sketch the tent is pitched at the corner of the Express building towards the service lane. Under the orders there cannot be any demonstration or dharna within 50 metres from the Express building. Unless contempt is pinged, defendants should not be heard.

(10) The next contention of Mr. Nariman is that unless a reasonable distance from the Express building is directed by this court, defendants shall indulge in violence. He submits that a distance of 100 metres from the Express building is reasonable. On December 3, 1987 Mr. Arun Jaitley, appearing for the plaintiff, also argued in continuation of arguments of Mr. Nariman. Mr. Jaitley submitted that 50 metres distance from the Express building should be maintained. He contends that the present case is not a case of ingress or egress or a case of intimidation. This is a case where gross acts of violence have been committed by the defendants and their supporters. Soda water bottles, acid bulbs etc have been used by the defendants. He has filed a photostat copy of the chart containing the details of various interim applications and suits filed in the High Court of Delhi where the High Court of Delhi has granted injunction in respect of the strike and the distance. Mr. Jaitley submits, varies from 50 metres to 200 metres. Reliance has also been placed on the judgment dated 25-5-1984 in the caseotM/s. Metal Forgings (P) Ltd. v. West Delhi Engineering Mazdoor Union & others, (S. No. 1366/83). In this case the distance was maintained at 20 yards from the factory and the place of residence.

(11) The next contention of Mr. Jaitley is that though police/Government is not a party to the present suit but this-court is empowered under Section 151 of the Code of Civil Procedure to issue directions to the police/ Government for complying the order of injunction issued by the court. Reliance has been placed on the judgments in Rayapati Audemma v. Pothineni Narsimham , Sunil Kumar Holder and others v. Nishikanta Bhandari and others and Satyanarayana Tiwariv. S.H.O., P.S. Santhoshnagar, Hyderabad and others, .

(12) In reply arguments, Mrs. Pappu has invited my attention to- various paragraphs of the plaint and submits that the allegations of violence are very vague and no detail has been given. Many of the employees has been mentioned but who has been physically assaulted and physically prevented. She has invited my attention to paragraph 6 where it is alleged that on October 28, 1987, 350 employees entered the building in an effort to bring out the edition but defendants and their supports successfully thwarted food supplies to these employees She submits that if there was violence, how these 350 employees could enter the Express building. Again, she submits that in paragraph 8 of the plaint, it is alleged that 410 members of the Union attended the meeting on November 18, 1987. If defendants were indulging in acts of violence how this alleged meeting was not disturbed.

(13) First question which arises for consideration is whether the jurisdiction of Civil Courts is barred under the provisions as contained in Section 18of the Trade Unions Act, 1926. Section 18 of the Trade Unions Act. 1926 reads as under : "18. Immunity from civil suit in certain cases-(1) No suit or other legal proceeding shall be maintainable in any Civil Court against any registered Trade Union or any office-bearer or member thereof in respect of any act done in contemplation or furtherance of a trade dispute to which a member of the Trade Union is a party on the ground only that such act induces some other person to break a contract of employment or that it is in interference with the trade, business or employment of some other person or with the right of some other person to dispose of his capital or of his labour as he wills. (2) A registered Trade Union shall not be liable in any suit or other legal proceeding in any Civil Court in respect of any tortious act done in contemplation or furtherance of a trade dispute by an agent of the Trade Union if it is proved that such person acted without the knowledge of, or contrary to express instructions given by the executive of the Trade Union." In Jay Engineering Works Ltd's. case (supra) which was heard by a Special Bench of five judges of Calcutta High Court, their Lordships were interpreting the provisions as contained in Sections 17 and 18 of the Trade Unions Act, 1926 which grants certain exemption to members of the Trade Union. Their Lordships have held that there ale no express provisions in the Trade Unions Actregulating strikes or picketing. But these are recognised weapons in armoury of labour. The word 'strike' in its broad significance has reference to a dispute between employer and his workers in the course of which there is concerted suspension of employment. It is further held : "It is clear, therefore, that no protection is available to the members of a trade union for any agreement to commit an offence. The charge against the employee in the writ petitions now before us is that they committed various offences underthe Indian Penal Codementioned above. The question is whether there was such an agreement among the workers as to exclude them from the immunity afforded by Section 17. When a group of workers. large or small, combined to do an act for the purpose of one common aim or object it must be held that there is an agreement among the workers to do the act and if the act committed is an offence, it must be similarly held that there is an agreement to commit an offence. The materials before us in this writ petition make it abundantly clear that the workers acted in a combination to achieve a common aim or object and it must, therefore, be held that there was an implied agreement among them for the purpose of achieving the common aim. It must also be held that in achieving that common aim they committed offences under the Indian Penal Code and in that view of the matter the immunity created by Section 17 of the Act is not available to the workers, assuming that all of them are members of a registered trade union."

(14) In The Premier Automobils Ltd. v. Kamlekar Shantaram Wadke of Bombay & Others and Automatic Electric Pvt. Ltd. v. Engineering Mazdoor Sabha & Others, , it was held as under :- "The principles applicable to the jurisdiction of the civil court in relation to an industrial dispute may be stated thus : (1) If the dispute is not an industrial dispute, nor does it relate to enforcement of any other right under the Act the remedy lies only in the civil court. (2) If the dispute is an industrial dispute arising out of a right or liability under the general or common law and not under the Act, the jurisdiction of the civil court is alternative, leaving it to the election of the suitor concerned to choose his remedy for the relief which is competent to be granted in a particular remedy. (3) If the industrial dispute relates to the enforcement of a right or an obligation created under the Act, then the only remedy available to the suitor is to get an adjudication under the Act. (4) If the right which is sought to be enforced is a right created under the Act such as Chapter Va then the remedy for its enforcement is either Section 33C or the raising of an industrial dispute, as the case may be".

(15) There is no dispute that the employees can go on a peaceful strike and there can be no interference, except on sufficient grounds. Industrial Disputes Actdoes not provide remedies in the nature of permanent or temporary injunctions. It appears that the Union resorted to strike after serving statutory notice as provided in Section 22of the Industrial Disputes Act. It is a legitimate right of the workers to make legitimate demands and, if not met, go on peaceful but legal strike. This right is so recognised under the Labour Laws. Trade Union has a right to pursue its trade union activities by peaceful methods. In M/s. Metal Forgings (P) Ltd., (supra), S.B. Wad, J. has dealt with the similar submissions to the effect that Section 18 of the Trade Unions Act bars the jurisdiction of Civil Courts either to entertain the suit in regard to the trade's dispute or pass an interim injunction order. Wad, J. referred in detail the case law on the subject and has held that the submissions made by the learned counsel appearing for workmen in that case were fully dealt with in the leading judgment of Calcutta High Court in Jay Engineering Works Ltd. and others, (supra). In the judgment it has been held that there is no ouster of jurisdiction of Civil Courts. Industrial Disputes Actdoes not provide for the remedies in the nature of permanent or temporary injunction.

(16) After applying the law laid down in the aforesaid judgments, I am of the view that plaintiff had made various allegations with regard to act of violence, physical assault, intimidation, threat of physical assault, throwing of soda water bottles and acid bulbs. Plaintiff has also placed on record sufficient documents in support of such allegations. No doubt defendants have denied all these allegations and in the affidavit defendants have stated that there has been no act of violence on the part of the defendants and other members of the Union and that there had been peaceful strike. In any case, when there are allegations of violence made by plaintiff in the plaint and in support of these allegations certain documents have been placed, then I am of the view that this is question which requires investigation. I am of the view that prima facie the suit is maintainable and this court has the jurisdiction to entertain the present suit. However, the fact whether any act of violence has been committed by the defendants and other members of the Union or not shall be decided in the suit. Section 18of the Trade Unions Act, 1926 is not applicable to the facts and circumstances of the present case.

(17) Coming to the next submission of defendants, that no restrictions can be placed by the court on the right of defendants to have demonstration etc. at a particular distance. In reply, learned counsel for plaintiff has cited various cases where the courts have directed the keeping of distance from 20 yards to 200 metres. I am of the view that how much distance should be there it depends upon the facts and circumstances of each case. The object is to prevent any act of violence, assault, gherao, threat of bodily injury, intimidation and prevention of ingress and egress of a willing worker. In the present case, the situation and surroundings of the premises in question have to be taken into consideration while fixing the distance and placing other restrictions on defendants. Restriction should not be such as to render ineffective and useless a peaceful strike or to deprive the workers of their legitimate rights. Restrictions in a given case should be reasonable keeping in view the totality of circumstances. Mrs. Pappu on behalf of the defendants has given the following undertaking : That defendants shall not physically prevent the ingress or egress of any willing worker to and from the Express building situate at Bahadur Shah Zafar Marg. Defendants shall not go in the service lane, i.e., the lane between the side of the Express building and the premises of Milap and also not go or move towards the other side and the back of the Express building and also not go towards the side gates of the Express building. Defendants will hold peaceful picketing or stage dharna in the middle of the railing and beyond the railing towards road, i.e., between the foot-step of the staircase (leading to main entrance) and the corner of the Express building towards service lane and may fix tent there. The Defendants will not hold any picketing demonstration or stage dharna within 15 metres from the foot-step of the staircase (leading to main entrance).

(18) Defendant No. 7 has also filed an affidavit whereby giving solemn undertaking on behalf of defendants to the court that no act of violence would be allowed on the part of any member of the Union.

(19) One factor is very important in the present case for considering the distance. This is that there is a sufficient vacant traingular space between the iron railing and the building where offices of plaintiff are situated.

(20) I have carefully considered the surroundings of the building. There is a road in front of the Express building which is a very busy road leading towards Harding Bridge. On this road mostly the offices and the printing presses of the leading newspapers are located. Then there is main Bahadur Shah Zafar Marg which is over-crowded. If distance is from the end of the building then it will mean the picketing will be in front of other building, namely, Milap building or the place where offices of Daily Tej are situated. This will create more trouble. I am of the view that some directions by means of an order coupled with the undertaking given by the defendants through counsel Mrs. S. Pappu and the undertaking given in the affidavit of defendant No. 7 with which I am satisfied, I accept undertaking and same shall meet the ends of justice. I hope that defendants shall abide by their undertaking. This will help in creating the harmony. Accordingly, defendants shall be bound by their undertaking to the following effect : Defendants shall not physically prevent the ingress or egress of any willing worker to and from the Express building situate at Bahadur Shah Zafer Marg. Defendants shall not go in the service lane, i.e., the lane between the side of the Express building and the premises of Milap and also not go or move towards the other side and the back of the Express building and also not go towards the side gates of the Express building. Defendants will bold peaceful picketing or stage dharna in the middle of the railing and beyond the railing towards road, ie., between the foot-step of the staircase (leading to main entrance) and the corner of the Express building towards service lane and may fix tent there. Defendants will not hold any picketing demonstration or stage dharna within 15 metres from the foot-step of the staircase (leading to main entrance). The undertaking given by defendants shall continue till the disposal of the suit.

(21) I also by this order hereby restrain defendants from doing any act of violence and also from assaulting or gheraoing or giving any threat of assault or gherao to any employee of plaintiff till the disposal of the suit.

(22) Mrs. Pappu submits that the police/Government is not a party, so no directions can be issued to the Delhi Police. Mr. Jaitley, learned counsel for plaintiffs submits that under Section 151 of the Code of Civil Procedure the Civil Courts have power to issue directions to the police to comply with the orders. Though police is not a party, still courts are empowered to issue directions under Section 151 of the Code of Civil Procedure. I am of the view that it depends on facts of each case as to what directions should be issued. While granting ex-parte injunction order dated November 27, 1987 I directed that a copy of the order be given to the S.H.O. Darya Ganj, New Delhi concerned for compliance. In continuation of the order dated November 27, 1987 a copy of this order be also sent to the S.H.O., Darya Ganj, New Delhi.

(23) Any expression used and observations made in this order shall not have any bearing upon the ultimate decision of the suit.

(24) EX-PARTE injunction granted vide order dated November 27, 1987 stands varied and modified by this order to the extent mentioned above.

(25) I.AS. 8869 & 8945/87 stand disposed of.

(26) I.A. 8952/87 is an application filed by defendants under Section 151 of the Code of Civil Procedure. In this application it has been alleged that plaintiff is recruiting musclemen in the garb of fresh employees so that they may disrupt the strike and threaten the striking workmen to abstain from trade union activities. This application was filed on November 30, 1987. After the filing of this application an affidavit of Mr. N.D. Aggarwal defendant No. 7 has been filed on December 2, 1987 in which it is alleged that the plaintiffis reomiting in place of the striking workmen. Mrs. Pappu submits that recruitment in place of defendants during the period of strike is prohibited. Mr. Jaitley fairly contends that the plaintiff shall not recruit any person accept with due process of law. In view of this I.A. 8952/87 stands disposed of.

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....

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मंगलवार, 20 सितंबर 2022

पत्रकारिता की कंटीली डगर- 37


एक पत्रकार की अखबार यात्रा की सैंतीसवीं किश्त


पत्रकारिता की कंटीली डगर

भाग- 37


88. कंपनी का अड़ियल रवैया भी रहा जिम्मेदार

हड़ताल न हो इसके लिए अखबार प्रबंधन और कर्मचारी यूनियन के बीच एक दिन पहले यानी 13 अक्तूबर 1987 को एक बैठक में बातचीत हुई थी। उस बातचीत में प्रबंधन 15 फीसदी बोनस देने को तैयार हुआ था जबकि कर्मचारी यूनियन का कहना था कि कंपनी ने अपनी बंबई यूनिट में इस साल भी 20 फीसदी बोनस दिया है इसलिए यहां भी उतना ही दे। यूनियन का कहना था कि बंबई यूनिट में कर्मचारियों की तनख्वाह भी दिल्ली से अधिक है इसलिए दिल्ली में भी उन्हीं दरों पर वेतन दिया जाए। प्रबंधन इसके लिए राजी नहीं था।  

इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली इकाई के कर्मचारीयूनियन के अध्यक्ष थे दिल्ली न्यूजपेपर वर्कर्स यूनियन के जुझारू नेता टीएम नागराजन जो इंडियन एक्सप्रेस के कर्मचारी नहीं थे। वे अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन के पत्रकार थे और एक प्रभावशाली ट्रेड यूनियन नेता माने जाते थे। कर्मचारियों का कहना था कि उन्होंने बाहर के मजदूर नेता को अपनी यूनियन का अध्यक्ष इसलिए बनाया क्योंकि अपने प्रतिष्ठान का कर्मचारी अध्यक्ष होता तो उसे इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन दबाव डातकर अपनी तरफ झुका लेता। इसपर इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन के सलाहकार एस गुरुमूर्ति का कहना था कि सरकार ने अखबार को बंद कराने की नीयत से इंडियन एक्सप्रेसकर्मचारी यूनियन में बाहरी आदमी को घुसा रखा है जिसे कंपनी कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। उनका कहना था कि बाहरी आदमी हमारे कर्मचारी यूनियन में घुसा रहेगा तो हो सकता है हम कल को कोई विशेष खबर छापना चाहेंगे तो यूनियन के कहने पर कर्मचारी उसे कंपोज करने से ही मना कर दें। इस आधार पर गुरुमूर्ति का कहना था कि यह हड़ताल सरकार द्वारा प्रायोजित है। इस आरोप पर इंडियन एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियन के उपाध्यक्ष प्रूफरीडर एम सी पाठक का कहना था कि हमने अखबार प्रबंधन को यह खुला ऑफर दे दिया है कि वह विपक्ष के नेता वीपी सिंह और मधु दंडवते समेत जिस किसी भी नेता से चाहे समझौता वार्ता करा ले।

एक्सप्रेस प्रबंधन ने इंडियन एक्सप्रेस  के पत्रकार मदन तलवार के नेतृत्व में अपनी एक समानांतर यूनियन बना ली थी। दोनों यूनियनों के लोग सारे दिन और रात अपना अलग-अलग जुलूस निकालते थे और नारेबाजी करते रहते थे। कंपनी के तीनों अखबारों इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस और जनसत्ता के लगभग सभी पत्रकार मदन तलवार की यूनियन में शामिल थे और वे इस हड़ताल के खिलाफ थे। इस यूनियन के समर्थन में तब के दिल्ली के महत्वपूर्ण नेता मदनलाल खुराना अपने साथियों के साथ इसमें शरीक होने आते थे। पुलिस का एक बडा दस्ता पूरे इलाके में तैनात रहता था। दोनों यूनियनें अपना जुलूस निकालतीं थीं। वहीं दोनों संगठनों के वहां शिविर भी चल रहे थे। उन दिनों दिल्ली मेंइंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ से छप कर आता था। उसके एकाध बंडल अगर यूनियन के हाथ लग जाता था तो वे उसे फूंक देते थे। उधर नागराजन की यूनियन के साथटाइम्स ऑफ इंडिया और दूसरे अखबारों की यूनियनें भी सालिडेरिटी में उभर आईं थीं। इंडियन एक्सप्रेस का एक दफ्तर (जो कंपनी का गेस्ट हाउस भी था) दिल्ली के चिड़ियाघर के पास भद्र लोगों की कालोनी सुंदरनगर में भी था। यहां मालिक रामनाथ गोयनका जी रहते थे। तबके नेता अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और मदनलाल खुराना अक्सर वहीं आकर सभी पत्रकारों से मिलते थे। प्रबंधन की तरफ से पत्रकारों को रोजाना वहीं बुलाया जाता था और उनकी हाजिरी भी वहीं सुंदरनगर दफ्तर में ही लगती थी।

बाहर के एक आदमी को इंडियन एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियन का अध्यक्ष बना लेने के मुद्दे पर अखबार के कर्मचारी भी दो भागों में बंटे हुए थे। अखबार के बहुत कम कर्मचारी टीएम नागराजन वाली यूनियन के समर्थन में थे। अखबार के आधे से भी कम कर्मचारी एक्सप्रेस बिल्डिंग के बाहर पहरेदारी कर रहे होते थे और उनमें गिनती के ही पत्रकार होते थे। तीनों अखबारों इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस और जनसत्ता के लगभग पत्रकार इस हड़ताल के खिलाफ थे और वे नई दिल्ली के सुंदर नगर स्थित अखबार समूह के मालिक रामनाथ गोयनका के घर से और आंध्र प्रदेश भवन से काम करते थे। ये सारे पत्रकार उन जगहों से तमाम खबरें तैयार करके अखबारों के दूसरे संस्करणों को भेजते रहते थे। इसी हड़ताल के दौरान जनसत्ता दिल्ली के कुछ पत्रकारों को चंडीगढ़ संस्करण में काम करने के लिए भी भेजा गया था। उन दिनों दिल्ली के अलावा सिर्फ चंडीगढ़ से ही जनसत्ता निकलता था। चंडीगढ़ से हीजनसत्ता की कुछ प्रतियां दिल्ली भेजने की भी कोशिश हुई थी। पर इस तरह दिल्ली के लिए बहुत कम प्रतियां ही छापी जा सकती थीं।

एक्सप्रेस ग्रुप के अखबारों का दिल्ली संस्करण छापना तभी संभव था जब सारे पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारी एक्सप्रेस बिल्डिंग दफ्तर के अदर जा पाते। इसलिए प्रबंधन ने दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर वेद मारबाह को पत्र लिखा कि पुलिस दिल्ली हाईकोर्ट के 20 जनवरी 1987 उस आदेश को लागू कराए जिसमें अदालत ने दिल्ली पुलिस को बाकायदा आदेश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग दफ्तर से 50 मीटर की दूरी तक किसी भी हड़ताली कर्मचारी को न फटकने दिया जाए। प्रबंधन की इस चिट्ठी पर भी दिल्ली पुलिस अपना पूरा दमखम नहीं दिखा सकी। पुलिस शायद जानबूझकर ऐसा कर रही थी और अदालत के आदेश का अनुपालन नहीं करा रही थी। फिर 27 नवंबर 1987 को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक नया आदेश जारी करते हुए पुलिस को फिर से निर्देश दिए और आदेश का अनुपालन कराने को कहा। इसके बाद ही 28 अक्तूबर 1987 को इंडियन एक्सप्रेस के जांबाज संपादक अरुण शौरी औरजनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी पत्रकारों की अपनी टीम के साथ एक्सप्रेस बिल्डिंग के भीतर घुस पाने में सफल हो गए। इसबीच प्रबंधन ने हड़तालियों को तालाबंदी कर देने की धमकी भी दे डाली। प्रबंधन की इस धमकी पर ज्यादातर गैर-पत्रकार कर्मचारी भी काम पर लौट आए। उस दिन करीब 350 कर्मचारी दफ्तर के भीतर दाखिल हुए थे। पर हड़तालियों ने काम पर लौटे इन कर्मचारियों के खाने-पीने का कोई सामान दफ्तर के भीतर नहीं जाने दिया। इस तरह उस दिन अखबारों की कुछ हजार प्रतियां छप भी गईं, पर अगली सुबह शहर के हॉकरों ने अखबारों को बांटने से ही मना कर दिया। इस तरह तमाम कोशिशों के वावजूद हड़ताल खत्म होते-होते रह गई।

89. बोफर्स पर हो रहे खुलासों से घबरा गई थी कांग्रेस

इस हड़ताल के समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। बोफर्स कांड पर हंगामा चल रहा था और इस मामले को उछालने में इंडियन एक्सप्रेस बहुत मुखर था। असल में अपने संपादक अरुण शौरी के नेतृत्व में उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने कांग्रेस और राजीव गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और जब हड़ताल हुई तो एक्सप्रेस का खुला आरोप था कि हड़ताल कांग्रेस पार्टी ने करवाई है और राजीव गांधी के नेतृत्व में पार्टी नहीं चाहती है कि अखबार छपे। अखबार का दिल्ली केंद्र पार्टी का पहला निशाना था। एक्सप्रेस समूह का यह आरोप भी था कि कांग्रेस पार्टी की शह पर कर्मचारी यूनियन के जरिए एक्सप्रेस के दूसरे केंद्रों में भी अशांति फैलाने के प्रयास चल रहे थे और यह सारी कोशिश इसलिए थी कि इंडियन एक्सप्रेस समूह कांग्रेस के खिलाफ खबरें न छाप सके। यह एक रोमांचक दौर था और अखबार प्रबंधन का यह दावा जरूर सही था कि हड़ताल गैर कानूनी है और ज्यादातर लोग हड़तालियों के साथ नहीं थे।

हड़तालियों की तुलना में हड़ताल का विरोध करनेवाले लोग बहुत अधिक थे और ऐसे में प्रबंधन के इस आरोप में सच्चाई नजर आती है कि हड़ताल प्रायोजित थी और कांग्रेस पार्टी ने करवाई थी। ऊपरी तौर पर भले ही यह हड़ताल मजदूरों और कर्मचारियों के लिए सुविधाओं तथा अच्छे वेतनमान की मांग के समर्थन में हुई थी पर कम से कम संपादकीय विभाग के लोगों के लिए यह सब महत्त्वपूर्ण नहीं था और वही लोग खुलकर हड़ताल का विरोध भी कर रहे थे। इसीलिए संपादकीय विभाग के लोग ही हड़तालियों के शिकार भी हो रहे थे। ऐसे में आज यह कहा जाए कि संपादकीय विभाग में काम करने के कम पैसे मिलते थेतरक्की भी नहीं मिलती थी और इन्हीं सब कारणों से जनसत्ता के पत्रकार दूसरों से काफी पीछे रह गए, पर 1987 की उस हड़ताल की स्थितियों पर विचार करें तो लगता है कि संपादकीय आजादी के आगे वेतन भत्तों का कोई मतलब नहीं था और अपनी इस आजादी के लिए कर्मचारी वेतन भत्तों की मांग करनेवाले हड़तालियों से भी भिड़ने को तैयार रहते थे। तकनीकी तौर पर देखने पर भले ही यह कर्मचारियों में फूट डालने का उदाहरण होदूसरे कर्मचारियों का साथ नहीं देने का मामला हो पर संपादकीय स्वतंत्रता के मूल्यों का भी यह एक मजबूत उदाहरण तो है ही।

इसमें कोई शक नहीं कि इस हड़ताल को कांग्रेस की शह मिल रही थी। दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन होती है इसलिए वह वही कर रही थी जो केंद्र सरकार की तरफ से इशारा होता था। पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट का कहा भी नहीं माना। हाईकोर्ट ने पुलिस से हड़तालियों को एक्सप्रेस बिल्डिंग से 50 मीटर दूर रखने को कहा था जिसका उनुपालन पुलिस ने नहीं किया। इसलिए हाईकोर्ट को यह आदेश दोबारा जारी करना पड़ा। फिर भी दिल्ली पुलिस ने आदेश नहीं माना। हड़ताल टूटने के दिन जब पत्रकारों को बेरहमी से पीटा गया और उनपर तेजाब फेंका गया तब एक्सप्रेस बिल्डिंग और आसपास पुलिस भारी संख्या में तैनात थी फिर भी हड़तालियों ने पत्रकारों पर हमला कर दिया और पुलिस चुपचाप उन्हें पिटते और चीखते-चिल्लाते देखती रही। दरियागंज के एसएचओ (थानेदार) भी वहीं थे पर वे एक गाड़ी में सो रहे थे। पत्रकारों पर हमला होता रहा और वे लहुलुहान होकर पानी के लिए भागते और चिल्लाते रहे पर थानेदार साहब और उनके सिपाही न कुछ देख पाए न जान पाए। केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी से पुलिस को शायद यही निर्देश दिया गया था। यह सब भी यही साबित कर रहा था कि यह हड़ताल कांग्रेस पार्टी की ओर से प्रायोजित था।

– गणेश प्रसाद झा

आगे अगली कड़ी में....